म्हारा हरियाणा – हरियाणवी संस्कृति साहित्य व भाषा को समर्पित एक प्रयास

क्या आप ऐसी भूमि की कल्पना कर सकते हैं जहां परिवार के धन का निर्धारण इस बात से होता है की परिवार में गायों की संख्या कितनी है! जहां हर सुबह सूरज हरी धान के खेतों पर अपनी किरणों का रंग बिखेरता है और शाम के रंगीन क्षितिज एक अपनी ही तरह की बोली में अनोखी और निर्दोष सौहार्द के गीत गुनगुनाते है।

हुक्के, खाट, पीपल, बरगद, कुए, दामण ……. जी हां, यही है हमारा हरियाणा ।

हालांकि सब कहते हैं कि हरियाणा हमारे देश की “ग्रीन बेल्ट” है, लेकिन हमने यह साबित कर दिया है कि हरियाणा सिर्फ़ देश  का “अन्नदाता” हि नहीं बल्कि औद्योगीकरण के लिए भी एक केंद्रीय बिन्दु बन के उभर रहा है

जहां वेदो का निर्माण हुआ, मिथकों और किंवदंतियों के साथ भरा हुआ, हरियाणा का 5000 साल पुरना इतिहास बहुत समृद्ध है। कुरुक्षेत्र युं तो एक साधारण क्षेत्रीय शहर की तरह दिख सकता है, लेकिन वास्तव में हिंदू शिक्षाओं के अनुसार यहि से ब्रह्मांड का उद्गम हुआ और यहि बुराई पर अच्छाई की विजय हुई। ब्रह्मा ने यहि मनुष्य और ब्रह्माण्ड का निर्माण किया और भगवान कृष्ण ने भगवद गीता का धर्मोपदेश दिया। इस्सी मिट्टी पर संत वेद व्यास ने संस्कृत में महाभारत लिखा। महाभारत युद्ध से भी पहले, सरस्वती घाटी में कुरुक्षेत्र क्षेत्र में दस राजाओं की लड़ाई हुई थी। लेकिन लगभग 900 ईसा पूर्व में, यह महाभारत का ही युद्ध था, जिसने इस क्षेत्र को दुनिया भर में प्रसिद्धि दिलाई। महाभारत ने हरियाणा को बहुधनीयका, भरपूर अनाज और बहुधना की भूमि, विशाल धन की भूमि का पता लगाया। “उत्तर भारत का गेटवे” की तरह खड़े हरियाणा कई युद्धों का साक्षी रहा है। पानीपत की तीन प्रसिद्ध लड़ाईएं हरियाणा के आधुनिक पानीपत शहर के पास हुईं।

हमारे यहां के लोग दुनिया में सबसे जुदा है ….. हम जो करते है खुल के करते हैं हमारा ये अपनापन ही तो है जो लोगो को हमारे पास खींच लता हैं … और हाँ भोजन को कैसे भूल सकता है कोई ?? 🙂 हम खाने के लिए जीते हैं मखण, दूध, खोया, मलाई, चूरमा, लाडू, गुड़, कढ़ी, बथुए का रायता, बाजरे की रोटी ..? “जित दूध दही का खाना इस्सा म्हारा हरयाणा” ….. इसे तो आपने सौ बार सुना होगा। यह वह भूमि है जहां आज भी खेतों में जाने वाले किसान अपने साथ रोटी और प्याज़ ले जाते हैं, जहां नाश्ते में लस्सी के बिना दिन अधूरा है और रात में लोगों को गर्म दूध के गिलास के बिना नींद नहीं आये। हमारे यहाँ हर क्षेत्र में अदालत और पुलिस स्टेशन जरूर है, लेकिन आज भी  हमारा विश्वास पंच-परमेश्वर और पारंपरिक पंचायती राज में ज्यादा हैं, वो कहते हैं न जब आपसी विचार-विमर्श और वार्ता से विवाद सुलझ जाये तो कोर्ट कचेरी के चक्कर कौन काटे। यद्यपि आधुनिक युग ने हरयाणा में भी बहुत कुछ बदला है , लेकिन आज भी हमारे यहाँ  विशेष रूप से गांवों में, हम चाचा-चाची, ताउ-ताई, दादा-दादी, भाई-भाभी ……. एक ही छत के नीचे, संयुक्त परिवार रहते मिल जायेंगे। आज भी हम अपने माता-पिता के परामर्श के बिना, चाहे छोटा हो या बड़ा , निर्णय नहीं लेते। हालांकि हमने आधुनिकीकृत दृष्टिकोण को अपनाया है, लेकिन आज भी हम पहले अपने बड़ों का सत्कार पहले और अपना खाना बाद में ग्रहण करते हैं।

हाँ हम अभी भी पुरानी और  पारम्परिक प्रथाओं को मान्यता देते हैं व् उनका नियमित पालन करते हैं चाहे वो हल हो या कुआँ ……। हरियाणा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का इतिहास वैदिक काल तक जाता है। राज्य के लोकगीत जिसे रागनी के नाम से भी जाना जाता है बहुत ही प्रसिद्ध है व् हरयाणा के इतिहास को संजोये हुए अनेक किस्से व् कहानिओं को संजोती है। हमारे हरियाणा के लोगों की अपनी परंपराएं हैं।ध्यान, योग और वैदिक मंत्र का जाप जैसी पुरानी परंपराएं आज भी लोगों  द्वारा निभाई व् मनाई जाती है। प्रसिद्ध योग गुरु स्वामी रामदेव हरियाणा के ही महेंद्रगढ़ से हैं। होली, दीवाली, तीज, मकर सक्रांति, राखी, दशहरा …….या फिर सावण का झूला त्यौहार हमारी परंपरा का एक अटूट हिस्सा है … .मेहन्दी हमारे लगभग सभी त्योहारों का एक अभिन्न हिस्सा है। हमारी संस्कृति और कला नाटक, किस्से, कहानी और गीतों के माध्यम से व्यक्त की जाती है जिसे गाँवों की आम भाषा में सांग बुलाते हैं। हमारे यहां लोग गहनों के बहुत शौकीन हैं। गहनों में आमतौर पर सोने और चांदी से बने होते हैं मुख्य वस्तुओं में हार, चांदी से बने हंसली (भारी चूड़ी), झलरा (सोने के मोहर या चांदी के रुपए की बनी लम्बी तगड़ी) करणफुल और सोने की बुजनी और पैरों में करि, पाती और छैल कड़ा पहनते हैं।

हमारी सबसे प्रमुख विशेषता तो हमारी भाषा ही है है या यूँ कहें, जिस तरीके और लहजे से यहाँ बात की जाती हैं वो ही तो अलग बनता है हमे।बंगारु हमारे यहाँ बोली जाने वाली सबसे लोकप्रिय बोली है जिसे आमतौर से हरियाणवी के नाम से जाना जाता है, हमारी बोली संभवतः बाहर के लोगों को ठेठ व उग्र प्रतीत हो, लेकिन इसमें ग्रामीण मिटटी की महक से भरपूर व्यंगात्मक सरलता और सीधापन भरा है। आप क्या बोलेंगे हमारे बारे में जो ऊपर से कठोर, बोली से उग्र लेकिन; दिल इतना साफ़ और मक्खन सा नरम? और इस भाईचारे के मक्खन का आनंद लेने के लिए, आपको हरियाणा आने की जरूरत नहीं है बस किसी रस्ते चलते हरयाणवी से दो बातें कर के देख लीजिये।

हरियाणा ने तेजी से आधुनिकता को अपनाया है;  आज, रिकार्ड समय के भीतर हरियाणा ने अपने सभी गांवों को बिजली, सड़कों और पीने योग्य पानी से जोड़ा है। आज हम भारत के सबसे समृद्ध राज्यों में से एक है, जो हमारे परिश्रम से ही नहीं बल्कि हमारी मिटटी हमारे पूर्वजों के के आशीर्वाद से फलित हो पाया है।

इसमें कोई संदेह नहीं है, यहां कर्म और अनुभव की अपार संभावनाए हैं और रहेंगी , जिन से जोड़ने का प्रयास हम सदैव करते रहेंगे …..

हमारा प्रयास है कि हम उच्च स्तरीय साहित्य व लेखन को बढावा दें व लुप्त होती हुई हरियाणवी विधाओं को जीवित रख सकें।


म्हारा हरियाणा कर्म में विश्वास रखता है और फल की इच्छा किए बिना, अपने नन्हें कदमों से लम्बे रास्ते पर निरंतर आगे बढ रहा है। यदि हरियाणवी भाषा के विकास में हम किंचित भी कुछ कर पाए तो अपने प्रयास को सफल समझेंगे।

आपके रचना सहयोग का स्वागत है। आप अपने सुझाव हमें mhaaraharyana@gmail.com पर ईमेल द्वारा भेज सकते हैं