क्या जमींदारा एक अभिशाप हैं ?

 


मैं 5 साल का ही पढ़ाई के लिए शहर चला गया था | जब छोटा था तो दादा जी के साथ खेत मे चला जाया करता था पर 1984 में दादा जी के देहांत के बाद हमने खेती बिलकुल छोड़ दी , सो उसके बाद कभी कभी ही खेत मे जाने का मौका मिलता वो भी यदि छूटियों मे गाँव जाने का मौका मिलता तब | उस वक़्त खेती में यूरिया खाद का इतना इस्तेमाल नहीं होता था | 1997 मे मैंने एक भाई की सलाह पर जैविक खाद का काम शुरू कर दिया परंतु जैविक खाद के बारे मे किसानों को ना ही ज्ञान था और ना ही इसमे कोई रुचि | उसी दौरान अखबार में आरसीएफ़ ने उज्जवला यूरिया के विक्रेता के लिए विज्ञापन निकाला | मैंने अपने रसूकों से आरसीएफ़ की वह एजेंसी ले ली | अब मैंने डीएपी यूरिया का सिर्फ नाम ही सुन रखा था परंतु मुझे यह नहीं पता था कि कब डीएपी मंगवानी हैं और कब यूरिया ? शुरू के साल मैं उस वक़्त यूरिया मँगवाता जब सीज़न जाने वाला होता | अगले साल महाराष्ट्र से पाटिल नाम के नए मैनेजर आए उनसे मेरी अच्छी मित्रता हो गई , उनके मार्गदर्शन में मैंने अगले सीज़न में फिर काम शुरू किया | इस सीज़न में मुझे खाद का खेल कुछ समझ आया | बरसात होते ही किसान यूरिया के लिए टुंट के पड़ते हैं | मैंने देखा कि जो बड़े व्यापारी हैं वह लोग सोसाइटीयों मे सैटिंग रखते हैं , जब देखा कि बरसात होने वाली हैं वह लोग सोसाइटी सचिव को बोल देते हैं कि गाड़ी एक दो दिन लेट कर दे और उसी में वह लोग अपना एक सीज़न का सारा खेल खेल जाते हैं | अब बेचारा किसान सोसाइटी मे खाद आने का इंतजार कर नहीं सकता सो वह बड़े व्यापारियों के चुंगल मे फसता हैं | खाद का सबसे बड़ा फंडा यह हैं कि यह उधार बहुत उठती हैं और किसान सोसाइटी मे खाद का इंतजार इसलिए करता हैं कि वहाँ उसे सस्ते ब्याज पर उधार मे खाद मिल जाती हैं | मैंने सोचा गाँव की उधार कहा जाती हैं इसलिए सेल बढ़ाने के लिए उधार मे खाद उठवा दी | अब मुझे यह नहीं पता था कि इसकी उधार वापिस नहीं आया करती , खास कर मेरे जैसे के लिए उगाही करना बहुत मुश्किल हैं और ऊपर से खाद मे मार्जिन कुछ नहीं | बड़े व्यापारियों के पास उगाही के अनेक तरीके हैं , वे तरीके मैं अपना नहीं सकता था , किसान की हालात देख वैसा करने को मेरा जमीर गवाही नहीं देता | जिस घर मे एक नौकरी हैं उसकी उधार तो आ जाती हैं पर जिस घर मे कोई नौकरी नहीं सिर्फ खेती की आमदनी पर निर्भर हैं उस किसान की उधार आनी बहुत मुश्किल होती हैं | उस सीज़न में मैंने काफी उधार दे दी , इतिफाक से उस साल बरसात भी ज्यादा नहीं हुई , जब मैं उधार मांगने जाता तो कोई ऊपर हाथ करके कह देता के भाई इस बार मर गए यो राम बरस जा तो दो दाने होंगे तभी दे पाएंगे , कोई कह देता की भाई आपके क्या घाटा है बाद मे ले लेना , कहने का मतलब तरह तरह के बहाने बनाते जिनमे कुछ सच्चाई भी थी | मेरे गाँव मे ही मैंने काफी उधार दे दी थी , एक दिन मैं गाँव मे ही उगाही के लिए निकला , बही मे नाम देख एक घर गया वहाँ देखा कि उसके सिर्फ दो कमरे का मकान , एक में खुद रह रहे थे दूसरे में न्यार तुड़ा डाल रखा था | मुझ देख कर समझ तो वो भी गए थे कि क्यों आया हूँ पर बोले कि साहब आले क्यूकर आया ? अब उस घर के हालात देख कर रुपए मागने की हिम्मत मेरी भी नहीं हुई , मैंने कहा कुछ नहीं चाचा यहा से निकल रहा था सो आ गया था | उसके बाद गाँव मे मेरा ऐसा अनुभव कई जगह हुआ आखिर में मैंने जो उधार अपने आप आई ठीक बाकी छोड़ दी , घरवालो से कह दिया कि यह मेरे बस की नहीं आप लोग उगाह लेना | बड़े व्यापारी लोग अपनी उधार पर किसान के ब्याज लगा देते हैं सो अलग साथ मे जो कीटनासक दवाई हैं वो किसान को ऐसे भाव पर देते हैं कि भाव जानकार हैरानी हो | मैंने एक कीटनासक दवा की एजेंसी भी ली हुई थी | मैंने जब दवा के थोक के और खुदरा के भाव देखे तो बड़ा हैरान हुआ | एक दवा मोनोक्रोटोफस थोक मे मुझे 110 रुपए लिटर मिल रही थी और उसका खुदरा भाव 450 रुपए तक | मैंने सेल्समैन से जब इस बारे में पूछा तो उसने बताया की खाद का मार्जिन और उधार देने का नुकसान व ब्याज इससे ही पूरा किया जाता हैं | इस सारे खेल में मर छोटे किसान की हैं जो पहले महंगे ठेके की ज़मीन लिए होता हैं ऊपर से महंगे भाव की दवा और खाद , ऊपर से इनकी उधार का ब्याज |
आज सब जगह खाद को ले कर जो ड्रामा चल रहा हैं जिसको ले कर केंद्र सरकार कह रही हैं कि हमने सभी राज्यों के कोटे की खाद बराबर भेजी हैं यदि ऐसा हैं तो फिर बीच मे यह खेल कौन खेल रहा हैं ? राज्य के मंत्री ब्यान दे रहे हैं कि किसान समय से पहले खाद ना ले खाद का कोटा पूरा हैं | अब ऐसा कह कर मंत्री जी किसे बहका रहे हैं समझ नहीं आया ? शायद मंत्री को ज्ञान नहीं हैं कि बरसात होते ही किसान को खाद चाहिए होती हैं , दूसरा , खाद कोई ऐसी चीज नहीं जिसे किसान लंबे समय के लिए स्टॉक कर ले क्योंकि लंबे समय तक रखने से यह जम कर पत्थर हो जाती हैं , जिसे बाद मे इस्तेमाल करने के लिए तोड़ना पड़ता हैं और चुरा होने पर कोई काम की नहीं | यह सब ड्रामा कालाबाजारी का चल रहा हैं नेता ऐसे ब्यान दे कर सिर्फ अपनी कमी छुपाना चाहते हैं |
खाद के काम के बाद मैंने व मेरे साथियों ने 1999-2000 में छतीसगढ़ मे खेती के लिए ज़मीन ली | उस वक़्त वहाँ पर हरियाणा , पंजाब के साथ साथ गुजरात के लोगो ने भी जमीने ले रखी थी | छतीसगढ़ में कानून के अनुसार कोई भी आदमी वहाँ के आदिवासियों की ज़मीन नहीं खरीद सकता | परंतु मैंने देखा कि वहाँ के आदिवासी खुद खेती ना कर हरियाणा , गुजरात वालों को 400 रुपए सालाना ठेके पर ज़मीन दे देते और फिर खुद अपनी ही ज़मीन पर 18 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से दिहाड़ी करते | जब इसके कारणो का पता किया तो पता लगा कि यह (आदिवासी) लोग खुद खेती करने से डरते हैं क्योंकि जो काम कभी संयुक्त पंजाब मे लालाओं ने कर रखा था वो ही खेल लालाओं ने हरियाणा पंजाब से यहाँ आ कर शुरू कर दिया हैं | यदि कोई आदिवासी खेती कर भी लेता तो वह बेचारा फिर इनके ब्याज के चक्रव्यूह मे फस कर रहा जाता है । इस चक्रव्यूह के डर से यह लोगो खुद कास्तकारी की बजाए मजदूरी ठीक समझते । वहाँ एक काम और देखा जब होली दिवाली रामनवमी आदि जैसा कोई त्योहार आ जाता तो फिर एक हफ्ते तक मजदूर मिलना मुश्किल | वहाँ आदिवासी एक हफ्ते तक इन त्योहारों के नशे मे रहते | कुछ तो लालाओं के ब्याज ने डरा रखा हैं , बाकी मेहनती मजदूरी करके दो चार आन्ने कमाते भी हैं तो उसको त्योहार के बहाने पाखंडियों ने लूटने की पूरी योजना बना रखी हैं | मंडी और पाखंडी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं यदि किसान मजदूर इस सिक्के के एक पहलू से बच भी जाए तो दूसरा पहलू इसे अपने दाव मे उलझा लेता हैं |
वहाँ की ज़मीन यहाँ के मुक़ाबले ज्यादा उपजाऊ हैं , हर फसल यहाँ के मुक़ाबले दुगनी होती हैं | हमने वहाँ खीरा , लोकी आदि बेल वाली सब्जी की खेती की और सीज़न मे यह हाल हो गया की सब्जी का बाजार मे भाव कम और सब्जी तुड़वाई की मजदूरी ज्यादा पड़ रही थी | लोकी खीरा का 50 पैसे प्रति किलो का भाव आ गया और उस वक़्त इन्ही सब्जियों का दिल्ली आजादपुर मंडी में थोक का भाव 10 रुपए प्रति किल्लो व खुदरा 20 रुपए प्रति किल्लो तक का था | रायपुर से दिल्ली आजादपुर मंडी तक का भाड़ा 4.50 रुपए प्रति किलो , मतलब 5 रुपए प्रति किलो मे आजादपुर मंडी में पहुँच थी | किसान को मिल रहे 50 पैसे जिसमे लागत मुनाफा तो दूर मजदूरी भी पूरी नहीं हो रही थी और बिचौलिये बैठे बैठाए मोटा मुनाफा कमा रहे थे | मासाखोरों का यह खेल आज भी वैसे का वैसे ही चल रहा हैं | वो कुत्ते की हड्डी वाली बात हैं जिसमे रस कुछ नहीं आता परंतु फिर भी वह उसे चबाता रहता हैं और चबाते चबाते उसके मसूड़ों से खून आने लगता हैं , वैसा ही हाल कुछ किसान का हैं उसे फसल का भाव मिले न मिले पर उसे तो हर साल एक नई आस मे यह कम करना ही हैं |
जब हम चौधरी छोटूराम की बात करते हैं तो कुछ लोग कह देते हैं कि वह समय और था अब समय बदल गया हैं | क्या बदला हैं मुझे समझ नहीं आया ? किसान के हालात तो अब भी वैसे के वैसे ही हैं , यह कह सकते हैं कि बस उसके शोषण के तरीके बदल गए हैं | जिस घर मे एक नौकरी हैं चाहे वह चपरासी की ही क्यों ना हों उस घर का गुजारा फिर भी ठीक हैं पर जो घर सिर्फ किसानी पर ही निर्भर हैं उसका तो जीवन नर्क हैं | किसान के घर मे तो दो वक़्त की सब्जी भी ढंग की नहीं बनती जबकि वो खुद पूरे देश को सब्जिया खिलाता हैं | मेरे गाँव का एक राजल नाम का चमार चिनाई मजदूरी करता था | एक दिन मुझे वो मिल गया मैंने पूछ लिया राजल आजकल कहाँ काम कर रहा हैं ? बोला की बनियों की चिनाई चल रही हैं वहाँ कर रहा हूँ | मैंने कहा क्या बात जाट छोड़ दिये ? वो बोला जाटों के खाने को क्या हैं ? ‘ एक दिन कढ़ी – एक दिन दाल , एक दिन चटनी – एक दिन टाल ‘ ! बनियों के खाने को बढ़िया माल मिलता हैं | उसकी बात मे दम था , जो किसानी करता हैं उसके हर घर का यही हाल हैं | समस्या यह हैं कि हमारे जो लोग सरकार मे हमारे नुमाइंदे बन कर जाते हैं वह भी वहाँ जा कर सब भूल जाते हैं | किसान की बदकिस्मती यह हैं कि एयरकंडिशनर कमरों मे बैठने वाले वो लोग जिन लोगो ने कभी जेठ की गर्मी और न कभी पोह का पाला देखा वो लोग किसान का मुकद्दर तय करते हैं | शास्त्रों मे लिखा हैं कि कृषि उत्तम पर लगता हैं ऐसा सिर्फ लोगो को बहकाने के लिए लिखा हैं | डॉक्टर चाहता हैं कि उसकी औलाद डॉक्टर बने , अफसर अपनी औलाद को अफसर बनाना चाहता हैं , नेता अपनी औलाद को नेता परंतु कोई किसान नहीं चाहता की उसकी औलाद किसान बने ! यह सब हालात देखते हुए तो ऐसा लगता हैं कि जमींदारा एक अभिशाप ही हैं | एक बार दो बंजारन आपस मे झगड़ रही थी तो एक बंजारन ने दूसरी बंजारन को अभिशाप देते हुए कहा ‘ भगवान करे अगले जन्म में तू किसी जमींदार के जन्म ले ‘ ।


-यूनियनिस्ट राकेश सांगवान


 

Author

achoudhary15@gmail.com
अखिल चौधरी म्हारा हरियाणा पोर्टल के प्रमुख लेखक है। वे हरयाणा के सोनीपत जिले के रहने वाले हैं। उनका उद्देश्य इस पोर्टल द्वारा हरयाणा की समय समायिक जानकारी के अलावा हरियाणा की भाषा, संस्कृति अवं लोक व्यव्हार को इंटरनेट के जरिये विश्व पटल पर लाना है।

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