ले भागवान और लिख वाले म्हारे पे काव्यांश।

एक बर की बात है अक नत्थू के पड़ौस मैं
कवि आकै रहण लाग्या।
जान-पिछाण काढण खात्तर नत्थू की बहू
रामप्यारी उनके घरां आन-जान लाग्गी।

जद उसनैं नयी पड़ौसन तैं बूज्झी अक
जीज्जी तेरा घरआला के काम करै है
तो वा बोल्ली-
यो कवि है अर मेरै पै रोज नई-नई
कविता लिखै है।

रामप्यारी तो भीतर ए भीतर
कती बलगी अर घरां आकै नत्थू तैं
उलाहना देते होये
बोल्ली- देख सारे जने अपनी-अपनी लुगाई नैं
सरहावैं सैं,
गाने अर कविता लिख-लिख कै रिझावैं सैं,
कदे दो अक्षर तैं भी मेरे बारे मैं बोल
दिया कर। वा नत्थू कै भूंडी ढाल पाच्छै
लाग ली।

दुखी होकै नत्थू बोल्या अक आज रात नैं
तेरे पै एक रचना गढ़ द्यूंगा। रात होते
ही रामप्यारी मचल कै बोल्ली- सुणा दे ईब
तो के गढ्या है तन्नैं?

नत्थू बोल्या-
आंख्या मैं तरै ढिड़ भरी रह,
पर तू मृगनयनी सी लागै।

चालणा तन्नैं आवै कोनीं
पर तू हिरणी सी लागै।

तेरे रूप की के तारीफ करूं ए रूपमती,

बारहां मन की धोबण है पर
ऐश्वर्या सी लागै।