जीवन परिचय; सूर्य कवि पंडित लखमीचंद और उनका हरयाणवी कविता संग्रह

पंडित लख्मीचंद का जन्म गांव जांटी कलां (सोनीपत) के एक सामान्य किसान परिवार में हुआ था। परिवार का निर्वाह बड़ी कठिनाई से होता था इसलिए बालक लखमी को पाठशाला भेजने का प्रश्न ही नही उठता। लखमी को घर के पशु चराने का काम सौंप दिया गया और वे एक पाळी का जीवन व्यतीत करने लगे। अन्य पाळियों से कुछ लोक गीत सुन सुन कर बालक लखमी को भी कुछ पंक्तियाँ याद हो गई। पशुओं को चराते-चराते लखमी भी कुछ न कुछ गुनगुनाता रहता।
इधर पशु चरते रहते, उधर लखमी अपनी धुन में रहता। धीरे-धीरे लखमी के गायन को मान्यता मिलने लगी। कुछ भजनी और सांगी उसे अपने साथ ले जाने लगे। परिवार वाले भी उनके इस शौक से चिंतित होने लगे लेकिन लखमी अपने गायन में मस्त रहे। एक बार गांव में कोई शादी थी और उस समय के प्रसिद्ध कवि और गायक मान सिंह का लखमी के गांव में आना हुआ। रातभर लखमी मंत्रमुग्ध हो मान सिंह के भजन सुनता रहा। लखमी उनसे इतना प्रभावित हुआ कि मन ही मन उसने उन्हें गुरु धारण कर लिया। तत्पश्चात् मान सिंह लखमी को संगीत की औपचारिक शिक्षा देने लगे। थोड़े ही समय में लखमी गायन कला में निपुण हो सूर्य की भांति चमकने लगे।
गायन में निपुणता प्राप्त करने के बाद लखमीचंद की अभिनय में रूचि पैदा हुई।  उस समय में अभिनय और सांग इत्यादि को अच्छा नहीं माना जाता था।  लखमी अपनी धुन के पक्के थे।  अब लखमी मेहंदीपुर के श्रीचंद सांगी की सांग मण्डली में सम्मिलित हो गए। फिर बाद में अपनी प्रतिभा को और निखारने के लिए सोहन कुंडलवाला के साथ काम करने लगे। कला निखारने हेतु लखमीचंद ने कई कलाकारों से सानिध्य रखा तथापि वे सदा मान सिंह को ही अपना गुरु मानते रहे।
अपनी गायन कला के दम पर न केवल हरियाणा में, बल्कि आसपास के राज्यों में भी रागनी को लोकप्रिय किया। बीस से अधिक सांगों की रचना की। नौटंकी और शाही लकड़हारा विशेष तौर पर प्रसिद्ध। हरियाणा के समाज और संस्कृति को बहुत गहरे से प्रभावित किया। सन् 1945 में देहांत। हरियाणा साहित्य अकादमी ने लखमीचंद ग्रंथावली प्रकाशित की है।

पं लखमीचंद की रागणियां


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

इस पृष्ठ पर हरियाणा के प्रसिद्ध रचनकारों की रागनियाँ उपलब्ध करवाई गई हैं।

हरियाणवी रागनियाँ

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