हरियाणवी कविता; इब्ब के होवेगा ?


इब्ब उम्र देवे साथ ,
उलाद ना देवे हाथ ,
इब्ब के होवेगा ?
मेरे बटे ,एक्ला ,
बैठ कूण में रोवेगा ॥ 

दिन थे तेरे कमाण के ,
जिब्ब खेले तन्ने ताश ,
बाळक रहए ना धोरे ,
घर का सत्यानाश ,
इब्ब के होवेगा ?
मेरे बटे ,एक्ला ,
बैठ कूण में रोवेगा ॥

जब थी देहि बनाण की ,
तन्ने रचाए रास ,
ज़र लाया शरीर के ,
जीण की रही ना आस ,
इब्ब के होवेगा ?
मेरे बटे ,एक्ला ,
बैठ कूण में रोवेगा ॥

किल्ले धरे गहणे ,
प्यारी पे छुल्वाई घास ,
आप धोळ कपडिया ,
घ्र्क्याँ माँह तें आवे बाँस ,
इब्ब के होवेगा ?
मेरे बटे ,एक्ला ,
बैठ कूण में रोवेगा ॥

— मखौलिये जाट कह दे सच्ची बात