हरियाणवी कविता: घरआली

 


मेरी घरआली धोरै नहीं कोए जैकपोट सै,
एक टूटी होड खाट मैं वा मारै लोट सै।

किसे काम तै वा जी नहीं चुरावै,
हर एक काम मैं कती ओन द स्पोट सै।

साबत दिन खेत का काम करै,
सांझ कै लावै घास का भरोट सै।

वा नहीं खांदी चटपटी चीज,
लंच उसका लस्सी,बाजरै के रोट सै।

फैशन तो वा माङा सा करती ए कोन्य़ा,
ना कैटरीना के अंगारां तै भी होट सै।

के बताऊँ थामनै,वा मन्नै किसी आच्छी लागै,
उस मेरी जान कै हाथ मैं मेरी जान का रिमोट सै।

— मखौलिये जाट कह दे सच्ची बात