हरियाणवी कविता: उल्टी गंगा पहाड़ चढा दी इसा नजारा देख लिया / हरिचन्द

 

उल्टी गंगा पहाड़ चढा दी इसा नजारा देख लिया
खेती करता भूखा मरता किसान बिचारा देख लिया

एक मिन्ट की फुरसत ना तूं 24 घन्टे काज करै
रोटी ऊपर नूण मिर्च फेर धरया मिलै सै प्याज तेरै
काम की बाबत सब कुणबे की गेल्यां भाजो भाज करै
फेर भी पेट भराई घर म्हं मिलता कोन्या नाज तेरै
घर म्हं बड़रे बाज तेरै ना हुवै गुजारा देख लिया

उठ सबेरे हळ जोड़ै तूं थारा बूढ़ा जावे पाळी सै
छोरा भेज दिया पाणी पै बुढ़िया गई रूखाळी सै
रोटी और जुआरा ले आवे तेरी घर आळी सै
सारा कुणबा मंड्या रहै फिर भी घर मैं कंगाली सै
तू रहै खाली का खाली सै तेरै टोटा भारया देख लिया

भूखा मरता करजा लेणे फेर बैंक मैं जावे सै
बाबु जी बाबु जी करकै छीदे दांत दिखावे सै
रिश्वत ले ले ठोक म्हारे पै फेर म्हारा केस बणावे सै
धरती तक गहणैं धरलें जब हमनै कर्ज थ्यावे सै
लूट लूट खावै सै उनका पड़ता लारा देख लिया

न्यूं म्हारा पैंडा छुटै कोन्या चाहे दिन रात कमाए जा
हमैं लुटेरा लूट लूट कै बैठ ठाठ तै खाए जा
बामण बणिया जाट हरिजन कहकै हमैं लड़ाए जा
हरिचन्द तेरी बी बा यूनियन न्यूएं लूट मचाए जा
टूटे लीतर पाट्या कुरता फुट्या ढारा देख लिया


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

इस पृष्ठ पर हरियाणा के प्रसिद्ध रचनकारों की रागनियाँ उपलब्ध करवाई गई हैं।

हरियाणवी रागनियाँ

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