हरियाणवी कविता: कदे ना सोची आपतै के दो-च्यार आने ले ले / लखमीचंद

 

कदे ना सोची आपतै के दो-च्यार आने ले ले
मेरा खर्च डेढ़ पा चून का, कीमत ना दो धेले

कंगला लड़का नीवै सै रै, जख्म जिगर नै सीवै सै रै
तूं मुंह ला ला कै पीवै सै रै भर दूधां के बेले

क्यूं होरया सेठ जाण नै रै, तू ना छोड़ै बुरी बाण नै रै
मनै सुखी रोटी दे खाण नै रै, तू छ्यौंके रोज करेले

मैं बिरथा जिन्दगी खोया करता, सांस मारकै रोया करता
मैं सिर पै लकड़ी ढोया करता, तू बेचे भर-भर ठेले

ईब तू सेठ बदी तै टळीए, करके हिसाब मेरै तै मिलिए
’लखमीचन्द’ सोच कै चलिए, गुरू मानसिंह के चेले


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

इस पृष्ठ पर हरियाणा के प्रसिद्ध रचनकारों की रागनियाँ उपलब्ध करवाई गई हैं।

हरियाणवी रागनियाँ

यदि आप कोई सुझाव या  संभंधित जानकारी साँझा करना चाहते हैं तो हमे mhaaraharyana@gmail.com पर ईमेल करें .