हरियाणवी कविता: कर कै खाले ले कै देदे उस तै कौण जबर हो सै / लखमीचंद

 

कर कै खाले ले कै देदे उस तै कौण जबर हो सै
नुगरा माणस आंख बदलज्या समझणियां की मर हो सै

नुगरा कुत्ता रेतली धरती खुद इंसान डरै इस तै
सप्त ऋषि और धुरू भक्त का खुद ईमान डरै इस तै
रामायण महाभारत गीता बेद और पुराण डरै इस तै
और किस किस का जिक्र करूं खुद भगवान डरै इस तै
खानदान का बाळक हो उसनै जात जाण का डर हो सै

दुनिया मैं दो चीज बताई टोटा और साहूकारा
जिस माणस मैं टोटा आज्या भाई दे दे दुत्कारा
जिस धोरै दो आने होज्यां लागै सब नै प्यारा
एक बेल कै कई फल हों सैं कोए मीठा कोए खारा
भीड़ पड़ी मैं देख्या जा ना तै किसकै कौण बिसर हो सैं

एक पेड़ के सरवे पै बण्या करतब न्यारा-न्यारा
एक हिस्से की कलम बणै सै एक हिस्से का डारा
एक मिट्टी के दो बर्तन सैं एक नूण का खारा
एक बणै बेहू का भाण्डा एक बणै घी का बारा
टोटे के मैं बालक बिकज्यां यो पेट बिकाऊ घर हो सैं

आदम देह नै जन्म धार कै करकै खाणा चाहिए
जैसी पड़ज्या वैसी ओटले परण निभाणा चाहिए
गिरता-गिरता गिर भी जा तै कितै ठिकाणा चाहिए
लखमीचन्द जिसा गाया करै उसा कर्म का गाणा चाहिए
गांव बिचाळै तख्त घलै जब पहलम चोट जिकर हो सैं


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

इस पृष्ठ पर हरियाणा के प्रसिद्ध रचनकारों की रागनियाँ उपलब्ध करवाई गई हैं।

हरियाणवी रागनियाँ

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