हरियाणवी कविता: कर जोड़ खड़ी सूं प्रभु लाज राखियो मेरी / लखमीचंद

 

कर जोड़ खड़ी सूं प्रभु लाज राखियो मेरी

मर्यादा को भूल गए दरबारां मैं शोर होग्या
दादा भीष्म द्रोणाचारी का हिरदा क्यूं कठोर होग्या
दुर्योधन दुशासन शकुनी कौरवों का जोर होग्या
अधर्मी राजा की प्रजा गैल दुख पाया करै
पाप की कमाई पैसा काम नहीं आया करै
सताए जां आप जो कोए ओरां नै सताया करै
हे कृष्ण हे कृष्ण कहकै ऊंचे सुर तै टेरी

सभी के मैं प्रश्न किया धीरे-धीरे फिरण लागी
कांपता शरीर रोई कौरवों से डरण लागी
भीष्म की तरफ कुछ इशारा सा करण लागी
नीति को बिसारा पिता क्यूं बैठे चुपचाप कहो
हारी सूं अक ना हारी सूं खोल कै नै साफ कहो
ये भी काम आपका है तोल कै इंसाफ कहो
मेरे प्रश्न का उत्तर दो थारी इतनी दया भतेरी

धर्म के विषय की बात समझकै बताई जा सै
धन की भरी थैली के अपणे हाथ से रिताई जा सै
दूसरे की चीज के जूए मैं जिताई जा सै
धर्मसुत बैठे जहां मैं के बेईमान हूंगी
आदि शक्ति फैसले पै बोलती जबान हूंगी
बीर का शरीर चीर मैं भी तो इंसान हूंगी
ये कौरव चीर तारणा चाहवैं करकै हेरा फेरी

लंका पै चढ़ाई करी सीता से मिलाए राम
जरतकारु फेर मिले छोड़ गए घर गाम
अनुसूईया अहिल्या तारा प्रेम से रटैं थी नाम
दमयंती की टेर सुणी नल को मिलाया फेर
देवयानी नै रट्या सखी कुए मैं गई थी गेर
सावित्री की बिनती सुणी पल की ना लगाई देर
कहै ‘लखमीचन्द’ भजन बिन यो तन माटी की ढेरी


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

इस पृष्ठ पर हरियाणा के प्रसिद्ध रचनकारों की रागनियाँ उपलब्ध करवाई गई हैं।

हरियाणवी रागनियाँ

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