हरियाणवी कविता: गऊ कहाया करते थे भारत के लोग लुगाई / ज्ञानी राम शास्त्री

 

गऊ कहाया करते थे भारत के लोग लुगाई
जोंक, भेडिये, मगरमच्छ अब देते नाग दिखाई

बण कै जोंक लहू चूसैं यें साहूकार देश के
भूखे नंगे फिरैं बेचारे ताबेदार देश के
कोठी बंगलां म्हं रहते असली गद्दार देश के
आंख मीच के सोग्ये सारे पहरेदार देश के
भरैं तजूरी ठोक ठोक करैं अन्धां धुन्ध कमाई

बणे भेड़िये भारत के यें परमट कोट्यां वाळे
नाम करा कै डिपू रूट दिन धौळी पाड़ै चाळे
मीठी मीठी बात करैं यें पर भीतर तै काळे
अफसर और वजीरां के झट बणैं भतीजे साळे
बकरी भेड़ समझ निर्धन नै करज्यां तुरंत सफाई

रिश्वतखोर मगरमच्छ बणगे खावैं ऊठ ऊठ कै
जै मिल ज्या मजबूर दुखी कोय पड़ते टूट टूट कै
लाखां के मालिक बणग्ये, लोगां नै लूट लूट कै
बिन रिश्वत ना काम करैं चाहे रोल्यो फूट फूट कै
आठों पहर रहैं मुंह बायें पापी नीच कसाई

काळे नाग बणे जहरी यें बड़े बड़े व्यापारी
चीनी तेल नाज घी लोहा कर लें कट्ठा भारी
फण ताणे बैठे रहैं भूखी मरज्या दुनिया दारी
चढ़ज्यां रेट शिखर म्हं जब यें जिनस काढ़ दें सारी
“ज्ञानी राम इन चार जणां नै कर दी घोर तबाही


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

इस पृष्ठ पर हरियाणा के प्रसिद्ध रचनकारों की रागनियाँ उपलब्ध करवाई गई हैं।

हरियाणवी रागनियाँ

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