हरियाणवी कविता: जगह देख कै बाग़ लगा दिया छोटी-छोटी क्यारी / लखमीचंद

 

जगह देख कै बाग़ लगा दिया छोटी-छोटी क्यारी।
तरह तरह के फूल बाग में, खुश्बो न्यारी-न्यारी।|(टेक)

दो दरवाजे गड़े बाग़ में देख्या भीतर बड़-कै,
एक पानी का चलै फुहारा, मन चाहवै जब छिडकै,
माणस राख लिया बाग़ बीच में, बाग़ का माली घड़ कै,
पत्ता तक भी तोड़ण दे ना, देखीं जा गिर-पड़ कै।

ना देखै तै किस नै बतावै, उस्सै की जिम्मेवारी।
तरह तरह के फूल बाग में खुश्बो न्यारी-न्यारी।|

दो दरवाजे लगे बाग़ में न्यारे न्यारे पाग्ये।
एक दरवाजा इसा लग्या, जो भीत्तर चीज पहुन्चादे।
दो दरवाजे और लगे जो सारी खबर सुनादे।
एक दरवाजा इसा लग्या जो गंदगी बाहर बगा दे।

दो दरवाजे इसे बाग़ में या दीखै दुनिया सारी।
तरह तरह के फूल बाग में खुश्बो न्यारी-न्यारी।|

बाग़ बीच में फिर कै देख्या, काफी चीज खाण नै।
एक पानी का पम्प चलै था, पीवण और नहाण नै।
जितना पानी गन्दा हो, एक रास्ता बाहर जाण नै।
एक दरवाजे पै लौड़ स्पीकर आनंद राग गाण ने।

छुट्टी के दिन पूरे होग्ये, फिर आ पहुंचा दरबारी।
तरह तरह के फूल बाग में खुश्बो न्यारी-न्यारी।|

तार टूट-कै कटा कनेक्सन, देता नहीं सुनायी।
अंख्या के दर बंद होग्ये, कुछ देता नहीं दिखाई।
सारी चीज मिली बाग़ में, ना चीज बहार तैं आई।
बाग़ छोड़ कै बहार लिकड़ गया कुछ ना पार बसाई।

कह लखमीचंद इस बाग़ नै या दुनिया सिर पै ठा-री।
तरह तरह के फूल बाग में खुश्बो न्यारी न्यारी।|


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

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