हरियाणवी कविता: दुख मैं बीतैं जिन्दगी न्यूं दिन रात दुखिया की / लखमीचंद

 

दुख मैं बीतैं जिन्दगी न्यूं दिन रात दुखिया की
के बूझैगी रहणदयो बस बात दुखिया की

के बूझो छाती मैं घा सै बोलतेए हिरदा पाट्या जा सै
और दूसरा नां सै दुख मैं साथ दुखिया की

मेरा ना किसे चीज मैं मोह सै, कुछ भी नहीं जिगर मैं धो सै
टोटे में के इज्जत हो सै, के जात दुखिया की

या होणी अपणे बळ हो सै, बात मैं सब तरियां छळ हो सै
दुख मैं निष्फल हो सै, जो करामात दुखिया की

‘लखमीचन्द’ कहै बेदन जगी, मैं धोखें मैं गई थी ठगी
थारे संग कैसे होण लगी मुलाकात दुखिया की


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

इस पृष्ठ पर हरियाणा के प्रसिद्ध रचनकारों की रागनियाँ उपलब्ध करवाई गई हैं।

हरियाणवी रागनियाँ

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