हरियाणवी कविता: बिगड़ी मैं कोई बाप बणै ना, चलती मैं सौ साळे देखे / हरीकेश पटवारी

 

बिगड़ी मैं कोई बाप बणै ना, चलती मैं सौ साळे देखे
बिगड़ी पीछे ठोकर खाते लाख करोड़ों वाळे देखे

चलती मैं छोटे छोट्यां की बड़े-बड़े पैंद तोड़ते देखे
बिगड़ी पीछे बड़े बड्यां के छोटे सिर फोड़ते देखे
चढ़ी हुई मैं दुश्मन आगे दुश्मन हाथ जोड़ते देखे
बिगड़ी मैं सुत-नार-जार मां जाए पीठ मोड़ते देह्के
चढ़ी हुई मैं गोरे पर पाणी भरवाते काळे देखे

चढ़ी हुई मैं खून करणिये डाकू बरी छूटते देखे
बिना खोट ही सड़ैं जेळ मैं जिनके करम फूटते देखे
चढ़ी हुई मैं दुष्ट पुरुष भी असरत ऐश लूटते देखे
बिगड़ी मैं सुख संपति के सारे प्रबंध टूटते देखे
चढ़ी हुई मैं चोर लुटेरे डाकू भी रखवाले देखे

चढ़ी हुई मैं पांच जणे कितनी बड़ी मार-मार गए थे
बिगड़ी मैं कोतर सुअ कैरौं बड़े-बड़े वीर हार गए थे
चढ़ी हुई मैं जापान जर्मन कई-कई मुल्क पार गए थे
जब बिगड़ी एक पल मैं सब योद्धा हथियार डार गए थे
चढ़ी हुई मैं अमरीका के सिक्के अजब निराळे देखे

चढ़ी हुई मैं एक तीर से मछली की चक्षु फूटी
जब बिगड़ी वही बाण चले ना गोपी भीलां नै लूटी
चढ़ी हुई मैं निगल दिया बिगड़ी मैं निगल गई खूंटी
नहीं चढ़ी का मोल-तोल और टूटी की कोई ना बूटी
“हरिकेश” नै चितौड़ मैं मण-मण के लागे ताळे देखे


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

इस पृष्ठ पर हरियाणा के प्रसिद्ध रचनकारों की रागनियाँ उपलब्ध करवाई गई हैं।

हरियाणवी रागनियाँ

यदि आप कोई सुझाव या  संभंधित जानकारी साँझा करना चाहते हैं तो हमे mhaaraharyana@gmail.com पर ईमेल करें .