हरियाणवी कविता: भाईयो बेरा ना के चाला रै ये घडी मै दे सें गर्द मिला / लखमीचंद

 

भाईयो बेरा ना के चाला रै ये घडी मै दे सें गर्द मिला।(टेक)
ब्रह्मा विष्णु सारे मोहे भस्मासुर से मारे गए।
जमदग्नि पुलिस्त मुनि पतंजली बिचारे गए।
मेर और सुमेर सुनो सीस जिन के तारे गए।
बारासूर बनाद भाई गौतम जी का फेरा मन।
बाल्मीकि गुरुवासा से मार डाले योगी जन।
अत्तरी और बतीस ऋषि चंदरमा का बिगाड़ा तन।

जिनकी खुडकै दिन रात माला रै शिवजी की लई खींच कला।
भाईयो बेरा ना के चाला रै ये घडी मै दे सें गर्द मिला।

परचेता और परसूराम रावण नै भी भेष भरा।
देवातावों से जत्ती मोहे आशकी मे बाली मरा।
कर्ण जैसे योधा खपगे माया तै ना कोए टरा।
दुर्योधन दुशाशन और जरासंध की बुधी हर ली।
जन्मय जी भी पुष्टि होगये किस्सी की ना पेश चली।
कीचकों का ढेर करया पांडों में था भीम बली|

वो था जग भूप का साला रै अग्नी मे दिया तुरत जला।
भाईयो बेरा ना के चाला रै ये घडी मै दे सें गर्द मिला।|

यादुवंशी कट कै मरगये अगड कै था कुटम्ब घना।
ऐसा भी कहाँ सें लोग पटेरे का लोहा बना।
चाल के चक्कर में आके संग पिस्से घुन और चना।
लैला और मजनू होगये लगी रही नैना झड़ी।
ऐश और अमीरी छुट्टी सुख तै कोन्या बीत्ती घडी।
राजा रोड पागल होगया लौलता लगी थी बड़ी।

जर जोरू जमीन हवाला रै ये रोग नै दें सें तुरत फला।
भाईयो बेरा ना के चाला रै ये घडी मै दे सें गर्द मिला।|

चोरी जारी जामनी झूठ बोलें करै ठगी।
देख पराया माल भाई तनमे बेदन आन जग्गी।
सारी दुनिया निंदा करै खोट्टी शामत आन लगी।
लख्मीचंद छंद कहै आशकी कै जात नहीं।
भूख प्यास जावो पर पड़े चैन दिन रात नहीं।
हाथ जोड़ माफ़ी मांगूं कोए बड़ी बात नहीं।
सतगुरु कहै बसौधि आला रै बड्यां की लियो मान सलाह।

भाईयो बेरा ना के चाला रै ये घडी मै दे सें गर्द मिला।


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

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