हरियाणवी कविता: माता बणकै बेटी जणकै बण मैं गेर गई / लखमीचंद

 

माता बणकै बेटी जणकै बण मैं गेर गई
पत्थर केसा दिल करके नै तज बेटी की मेर गई

नौ महीने तक बोझ मरी और पेट पाड़ कै जाई
लहू की बून्द गेर दी बण मैं शर्म तलक न आई
न्यारी पाट चली बेटी तै करली मन की चाही
पता चल्या न इसी डाण का गई कौणसी राही
ऊंच नीच का ख्याल करया ना धर्म कर्म कर ढेर गई

लड़की का के खोट गर्भ तै लेणा था जन्म जरुरी
नो महीने मैं पैदा हुई और कोन्या उमर अधूरी
इसी मां कै होणा था जो बेअक्कल की कमसहूरी
या जीवै जागै सफल रहै भगवान उमर दे पूरी
जननी बणकै बेटी सेती किस तरियां मुंह फेर गई

मनै ज्यान तै प्यारी लागै पालन पोषण करूं इसका
कती नहीं तकलीफ होण दयूं पेटा ठीक भरूं इसका
पुत्री भाव नेक नीति बण आज्ञाकार फिरूं इसका
शकुन्त पक्षी का पहरा सै तै शकुंतला नाम धरूं इसका
‘लखमीचन्द’ कहै दया नहीं आई दिन मैं कर अंधेर गई


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

इस पृष्ठ पर हरियाणा के प्रसिद्ध रचनकारों की रागनियाँ उपलब्ध करवाई गई हैं।

हरियाणवी रागनियाँ

यदि आप कोई सुझाव या  संभंधित जानकारी साँझा करना चाहते हैं तो हमे mhaaraharyana@gmail.com पर ईमेल करें .