हरियाणवी कविता: मात पिता के मरें बाद आंसू टपकाकै के होगा / ज्ञानी राम शास्त्री

 

मात पिता के मरें बाद आंसू टपकाकै के होगा
जिन्दें जी जूते मारे फेर फूल चढ़ाकै के होगा

कहणा मन्या नहीं कदे फेर तिलक लगणा ठीक नहीं
छुए कोन्या पैर कदे फेर शीश झुकाणा ठीक नहीं
राखे सदा अन्धेरे म्हं फेर दीप जळाणा ठीक नहीं
नाक चढ़ाकै रोटी दी फेर पिंड भराणा ठीक नहीं
बोले कड़वे बोल सदा फेर श्राद्ध कराकै के होगा

बिछुड़ॆ बाद बड़ाई करते बेटे पोते देख लिये
कर कर य्काद लाड़ बचप्न के पाछै रोते देख लिये
पितरां खातिर गंगा जी म्हं लाते गोते देख लिये
लगी हुई कमरां में फोटू मल मल धोते देख लिये
रहे तड़पते वस्त्र बिन फेर शाल उढ़ाकै के होगा

काढ़े दोष सदा जिनके फेर पाछे तै गुण गावैं सैं
दुखी करे जिन्दगी भर फेर मन्दिर में पत्थर लावैं सैं
घूर घूर देखणियें फेर फोटू पै ध्यान जमावैं सैं
सदा उछाळी पगड़ी फेर पग़ड़ी की रस्म निभावैं सैं
दुख म्हं करी नहीं सेवा फेर पेहवे जाकै के होगा

कर ल्यो जिन्दे जी सेवा या आच्छी किसमत थारी सै
आर्शीवाद मिले दिल तै जो बेटा आज्ञाकारी सै
खुद अपनी संतान भला ना लागै किस नै प्यारी सै
कोए अमर ना रहा जगत म्हं आखिर सब की बारी सै
“ज्ञानी राम” दो हरफी कह दी ढोल बजाकै के होगा


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

इस पृष्ठ पर हरियाणा के प्रसिद्ध रचनकारों की रागनियाँ उपलब्ध करवाई गई हैं।

हरियाणवी रागनियाँ

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