हरियाणवी कविता: रै संता सील सबर संतोष श्रधा शर्म समाई सै / लखमीचंद

 

रै संता सील सबर संतोष श्रधा शर्म समाई सै, यो साधन संत शरीर का।|(टेक)

भय भूल भ्रम ने त्याग, विषय वासना बैर की लाग।

अरै जा जाग जरा नाजोश जहर जड़ जबर जमाई सै यो जोबन जाल जंजीर का।
रै संता सील सबर संतोष श्रधा शर्म समाई सै, यो साधन संत शरीर का।|

लागी लगन ले लिया योग होकै लौलीन रहे जो लोग।

ऋषि कै रोग रहा ना रोष रमता राख रमाई सै यो रंग रचज्या रंगबीर का।
रै संता सील सबर संतोष श्रधा शर्म समाई सै, यो साधन संत शरीर का।

या दुनिया दुःख की दारण लगे देह धार धर्म ने हारण।

करतब कारण करनी ने कोस कुकरम कुबध कमाई सै गुनाह कुण कमशीर का।
रै संता सील सबर संतोष श्रधा शर्म समाई सै, यो साधन संत शरीर का।

मुक्ति मिलै मतिमंद मरले लखमीचंद सहम में फिरले।

अरै करले तजकै त्रिया दोष थोड़ी सी तपा तपाई सै फेर जप तप तकदीर का।
रै संता सील सबर संतोष श्रधा शर्म समाई सै, यो साधन संत शरीर का।


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

इस पृष्ठ पर हरियाणा के प्रसिद्ध रचनकारों की रागनियाँ उपलब्ध करवाई गई हैं।

हरियाणवी रागनियाँ

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