हरियाणवी कविता: सुण मजदूर किसान मान तेरी दुख मैं ज्यान घली है / हरिचन्द

 

सुण मजदूर किसान मान तेरी दुख मैं ज्यान घली है

सारा कुणबा मंड्या रहै सै फेर भी सुख का सांस कोन्या
एक बख्त टुकड़ा मिलज्या तो दुसरे की तनै आस कोन्या
लाकड़ होग्या तेरे शरीर का रह्या गात पै मांस कोन्या
पीळा पड़ग्या नक्शा झड़ग्या छिड़ग्या जी नै रासा सै
नहीं लंगोटी चिंता मोटी रोटी का भी सांसा सै
दुखड़ा भरणा धन्धा करणा घर ना और उपासा सै
तेरा बासा सै बेकार यार हर बार ये बात चली है

बख्ते उठ खड्या होज्या तू लाग काम पै जावे सै
माटी गेल्यां माटी होकै अपणी ज्यान खपावै सै
तूं हाड तोड़ की करै कमाई फेर भी दुखड़ा ठावे सै
तेरै नहीं छान तू हुआ बरान तेरी फंसगी ज्यान झमेले म्हं
तेरा कुणबा सारा फिरै बिचारा मार्या-मार्या हेले म्हं
ना कोड्डी पावै खड्या लखावै जब चाहवै ब्याह टेले म्हं
तेरी गेले म्हं परिवार बाहर हो त्यार जब रात ढळी है

पोह का पाळा पाणी देणा मारै दोहर की गाती है
जेठ साढ़ म्हं हळ जोड़ै जब चालती लू ताती है
बुढा पाळी बुढिय़ा रूखाळी रोटी घर आळी लाती है
बोवै बाहवै फसल उगावै ठावै सै जब होज्या त्यार
भरकै गाड्डी तुमने ठाडी जा ला दी लाला कै बार
आगै पावै जो साफ बणावै मजदूर लगावै इसमें झार
फेर सरकार लूट ले माल हाल एक दो तीन काल छळी है

म्हारी मेहनत का रेट बावळे ले रे अपणे हाथां मैं
सस्ती ले कै मंहगी देरे खाज्यां बातां बातां मैं
म्हारे पैर उभाणे सिर तै नंगे ना कुरते छोड्डे गातां मैं
मारे ज्यान तै कहूं ईमान तै बात ध्यान तै सुण ले भाई
एक हो ज्याओ सभा बणाओ आओ दूर करां कठिनाई
वर्ग लुटेरा जो दुख देर्या घेरा देकै लड़ो लड़ाई
सै कवीताई का खेल गेल ध्रुव मेल की बात भली है


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

इस पृष्ठ पर हरियाणा के प्रसिद्ध रचनकारों की रागनियाँ उपलब्ध करवाई गई हैं।

हरियाणवी रागनियाँ

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