…और छात्राओं ने भूख हड़ताल करके हासिल किया स्कूल

हरियाणा में गोठड़ा और राजगढ़ गांव में पिछले महीने तमाम छात्राएं गांव के स्कूल को बारहवीं तक करने की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठीं. अंतत: सरकार ने उनकी मांग मान ली.

 

हरियाणा में गोठड़ा और राजगढ़ गांव में पिछले महीने कई छात्राएं गांव के स्कूल को बारहवीं कक्षा तक करने की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठी थीं. छात्राओं के मुताबिक़ घर से स्कूल बहुत दूर हैं. अकेले रास्ता तय करने के दौरान उनके साथ छेड़छाड़ होती है. इस कारण परिवार वाले अक्सर ही उन पर पढ़ाई छोड़ने का दबाव डालते हैं.

रेवाड़ी ज़िले के गोठड़ा गांव की क़रीब 80 स्कूली छात्राएं 10 मई से भूख हड़ताल पर बैठी थीं. उनकी मांग थी कि उनके गांव के सरकारी स्कूल को दसवीं कक्षा से बढ़ाकर बारहवीं तक किया जाए. भूख हड़ताल आठवें दिन ख़त्म हुई जब सरकार ने उनकी मांग को स्वीकार कर एक पत्र जारी किया.

इन लड़कियों के हवाले से हिंदुस्तान टाइम्स का कहना है कि उन्होंने गांव के सरपंच से भी शिकायत की थी, जिन्होंने इस मामले को आगे भी बढ़ाया पर कोई हल नहीं निकला. इसलिए लड़कियों ने यह मांग उठाई कि उनके गांव के ही स्कूल को बारहवीं कक्षा तक अपग्रेड किया जाए. इसी मांग की पूर्ति के लिए वे भूख हड़ताल कर रही थीं.

वहीं गांव के सरपंच सुरेश चौहान बताते हैं, ‘इन बच्चियों को दूसरे गांव आने-जाने की समस्या तो है ही, पर इन्हें सड़क पर हो रही छेड़छाड़ का भी सामना करना पड़ता है. कुछ लड़के रोज़ाना बाइक पर हेलमेट पहनकर आते हैं और इन लड़कियों से बदतमीज़ी करते हैं. हेलमेट होने की वजह से उनकी पहचान भी नहीं हो पाती.

भारत में ब्राह्मणवादी पितृसत्ता, परिवार, समाज और राज्य के द्वारा अलग-अलग माध्यमों से रोज़मर्रा के जीवन में अपने मौजूद होने का एहसास कराती है. वहां हरियाणा जैसे राज्य जहां का जाति-वर्ग व्यवस्थित पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं को नियंत्रित करके रखता है और आए दिन खाप पंचायत से लेकर हरियाणा हाईकोर्ट भी महिला विरोधी आदेश सुनाती है.

वहां स्कूल की छात्राओं का ये आंदोलन जिसमें वो पढ़ने-लिखने को अपनी मुक्ति का एकमात्र रास्ता समझते हुए उस पढ़ाई के लिए लड़ रही हैं. छात्राएं अपने आंदोलन के ज़रिये समाज के जाति और पितृसत्तात्मक पिंजरों को तोड़ते हुए सरकार को अपनी मांगें पूरा करने के लिए मजबूर कर रही हैं. और आज के दौर में शिक्षा के निजीकरण के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठा रही हैं.

लड़कियों के इस आंदोलन के बाद ‘पिंजरा तोड़ आंदोलन’ की कुछ महिलाओं ने इन छात्राओं से मिलकर बातचीत की, उनके मुद्दे को समझा और आंदोलन के साथ एकजुटता दिखाई. इसके बाद पिंजरा तोड़ ने अपने सर्वेक्षण पर आधारित एक रिपोर्ट भी सार्वजनिक की.

इस रिपोर्ट में कहा गया, ‘मई के पहले हफ़्ते में गोठड़ा सरकारी हाई स्कूल की लगभग 80 छात्राएं अपने स्कूल को अपग्रेड करने की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठीं. भूख हड़ताल आठ दिन बाद ख़त्म हुई, जब सरकार ने उनकी मांग को स्वीकार कर एक पत्र जारी किया. छात्राओं को 4 किलोमीटर दूर कांवाली स्थित माध्यमिक विद्यालय तक जाने के रास्ते में अक्सर ही छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है. जिसके कारण अक्सर ही उनपर उनके परिवार द्वारा दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ने का दबाव बनाया जाता था और बहुत से माता पिता अपनी बेटियों को निजी स्कूलों में भेजने में असमर्थ होते हैं.

लड़कियों के मुताबिक उन्होंने सब करके देख लिया पर कुछ भी परिणाम न मिलने पर उन्हें भूख हड़ताल करने का रास्ता ही दिखा .स्कूल अपग्रेडेशन होने से उन छात्राओं को छेड़छाड़ के डर से अपनी पढ़ाई नहीं छोड़नी पड़ेगी.

राजगढ़ में 13 दिनों से हड़ताल पर बैठी छात्राओं का अनुभव भी कुछ मिलता जुलता रहा है. कुछ छात्राएं ख़ुश थीं कि स्कूल का बारहवीं तक अपग्रेडेशन होने से वो अपनी पढ़ाई जारी रख पाएंगी. यहां भी ये मांग लंबे समय से चल रही थी, यहां स्कूल को 2012 में ही सभी प्रकार की आवश्यकताओं और बुनियादी ढांचे उपलब्ध कराने के बावजूद लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए या तो 6 किमी दूर बालावास या बावल और रेवाड़ी के क़स्बों में जाना पड़ता था.

हालंकि रेवाड़ी और राजगढ़ दोनों ही जगह के स्कूल छात्राओं को सिर्फ़ आर्ट्स के माध्यम से ही पढ़ाई करने का मौक़ा दे पाते हैं. वर्तमान दौर में जब शिक्षा का निजीकरण इतने बड़े पैमाने पर हो रहा है, हरियाणा की छात्राओं का ये आंदोलन आपने आप में महत्वपूर्ण क़दम है, जिसके ज़रिये उन्होंने शिक्षा के निजीकरण के इस ढांचे को बड़ी चुनौती दी है. छात्राओं ने अपने आंदोलन से उन उत्पीड़कों को भी क़रारा जवाब दिया जो शायद ये सोचते थे कि लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करके उनको अपना उद्देश्य पूरा करने से रोक सकेंगे.

दसवीं के नतीजों की घोषणा के बाद हरियाणा में कई जगह नतीजों के पुनर्मूल्यांकन को लेकर प्रदर्शन हो रहे थे. साथ ही और भी जगहों पर जैसे जींद, सोनीपत, रेवाड़ी और बिलासपुर में भी छात्राओं के आंदोलन की गूंज सुनने को मिल रही थी. इन सभी जगह छात्राओं ने शिक्षा को सुलभ बनाने, कक्षाओं, स्कूलों और अध्यापकों की संख्या में वृद्धि, सुरक्षित वातावरण और अन्य बुनियादी सुविधाओं को छात्राओं तक पहुंचाने की मांग की थी.

छात्राओं की स्कूल अपग्रेडेशन की मांग को लेकर इस आंदोलन में मिली जीत से हर उस संघर्ष को प्रेरणा मिलती है जो घर से लेकर शैक्षिक संस्थानों तक भेदकारी ढांचों को हर रोज़ चुनौती दे रहे हैं. इन संघर्षों से छात्राओं ने उन सभी सामाजिक ढांचों और नीतियों को चुनौती देते हुए नकारा है जो शिक्षा को सुलभ बनाने के मार्ग में रोड़ा हैं.’

पिंजरा तोड़ आंदोलन की अंशिता दावर जो गोठड़ा गांव में सर्वेक्षण के लिए गई थीं, उन्होंने कहा, ‘इन छात्राओं का सामूहिक संघर्ष हमें प्रेरणा देता है, जहां विरोध करते हुए इन छात्राओं ने एक तरह से कहा कि सरकार को सबके लिए शिक्षा को सुलभ बनाना होगा. इनका संघर्ष पढ़ाई के लिए एक सुरक्षित माहौल की ज़रूरत को भी सामने लाया. इन छात्राओं का संघर्ष शिक्षा के निजीकरण को बड़ी चुनौती है, हम इन सभी महिलाओं के साथ एकजुट हैं.’

पिंजरा तोड़ आंदोलन से जुड़ी सुभाषिनी का कहना है कि ‘हमने इन छात्राओं से जाकर बात करना इसलिए ज़रूरी समझा क्योंकि हमारा संघर्ष सिर्फ़ उन 46 प्रतिशत तक सीमित नहीं है जो स्कूल तक आ चुकी हैं. अगर स्कूल के स्तर पर संघर्ष नहीं होगा तो स्कूल से उच्च शिक्षा तक महिलाएं कैसे पहुंचेंगी?’


ये खबर The Wire के सौजन्य से प्रस्तुत है।


 

Author

achoudhary15@gmail.com
अखिल चौधरी म्हारा हरियाणा पोर्टल के प्रमुख लेखक है। वे हरयाणा के सोनीपत जिले के रहने वाले हैं। उनका उद्देश्य इस पोर्टल द्वारा हरयाणा की समय समायिक जानकारी के अलावा हरियाणा की भाषा, संस्कृति अवं लोक व्यव्हार को इंटरनेट के जरिये विश्व पटल पर लाना है।

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