क्या दिल्ली में फैले प्रदुषण की समस्या के लिए हरयाणा के किसानों को जिम्मेदार मानना ठीक है ?

 

एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रदूषण के कारण दिल्ली में सालाना 10,000 से 30,000 जानें जा रही हैं. प्रदूषण हर दिन भारत की राजधानी में औसतन 80 लोगों की जान ले रहा है. दिल्ली की हवा में जब जब प्रदुषण का जहर घुला है उसका भांडा अक्सर हरयाणा के किसानो पर फोड़ा जाता है। तो आज चलिए उन लोगों को आईना दिखा ही दिए जाये जो सचाई से कोसों दूर हैं .

दिल्ली में पिछले तीन सालों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट के नाम पर सरकार ने क्या कदम उठाए ? जी हमने डीटीसी की बसों की संख्या 5500 से घटाकर 3600 कर दी जी। और हाँ मेट्रो के तीसरे फेज में बस तीन साल की देरी हुई है और हमने अभी तक 159 कम की लाइन में केवल 22 कम की लाइन जोड़ी है . और जी हां ये तो में भूल ही गया की हमारी दिल्ली में रोज़ सड़कों की सफाई वैक्यूम क्लीनर से होती है और आस्मां से पानी छिड़क कर धूल को दबाया जाता है। और हाँ ये तस्वीर तो दिल्ली की बिलकुल है ही नहीं हमारे यहाँ तो ज्यादातर लोग या तो पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते हैं या फिर साइकिल चलाकर ऑफिस पहुँचते हैं।

तो नेताजी हम आपको बता दे की केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम (एनएएमपी) के अनुसार, दिल्ली की हवा में 2009 से  पीएम 2.5 और पीएम 10 स्तरों में लगातार वार्षिक वृद्धि दर्ज की गयी। हाल की के वर्षों में (2015, 2016 और 2017) तो इनमे रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ोतरी हुई है। तो ऐसे में सिर्फ किसानो पर दोष मढ देना कहाँ तक सही है ये तो वही राजनेता व् सरकार बता सकती हैं जो केवल समस्या का निदान करने के बजाये बहाने बनाकर जनता को बेवक़ूफ़ बनाना चाह रही हो। या फिर आप ये कह दे की यहाँ प्रदुषण की समस्या केवल सर्दिओं में ही होती हैं जब हरयाणा में धन की कटाई होती है बाकि पूरा साल तो यहाँ कोई समस्या है ही नहीं।

आईआईटी दिल्ली ने पिछले साल निष्कर्ष निकाला कि दिल्ली को गाड़ियां सबसे ज्यादा प्रदूषित करती हैं। इसके बाद इंडस्ट्री, पावर प्लांट और घरेलू स्रोत प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं। वहीं, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा किए गए एक अध्ययन (2007-10) के मुताबिक गाड़ियों के उत्‍सजर्न से नाइट्रोजन ऑक्साइड बढ़ता है, जबकि पीएम 2.5 का कारण सड़क पर उड़ने वाली धूल है। इसके विपरीत दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने सीपीसीबी की रिपोर्ट को यह कहकर नकार दिया था कि उनकी कार्यप्रणाली दोषपूर्ण है। पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के रिसर्च फेलो भार्गव कृष्णा ने कहा कि चीजे काफी बदल चुकी हैं। उन्होंने कहा कि दिल्ली का चरित्र बदल चुका है और शहर में गाड़ियों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है। इसलिए सीपीसीबी के निष्कर्ष में खामिया हो सकती हैं। दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या के लिए आम तौर पर सीपीसीबी का अध्ययन इस्तेमाल किया जाता है।

तो आज जरुरत ये है की हम हर उस कारक का संज्ञान ले जो आज प्रदूषण के लिए उत्तरदाई है चाहे वो कंस्ट्रक्शन से उपजी धूल हो या फिर उधोगिक इकाईओं से निकलने वाला धुआं। राजधानी के लोगों की क्रय क्षमता बढ़ने के साथ साथ कारों की बिक्री में तेज बढ़ोत्तरी हुई है. हर रात राजधानी की सड़कों पर कम से कम एक करोड़ कारें अपने रास्ते चलती हैं. और एक ट्रांसपोर्ट रजिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट के आंकड़े के मुताबिक हर रोज़ लगभग 1200 नयी कारें दिल्ली की सड़कों पर उतर रहीं हैं। इसकी रोकथाम के लिए सर्कार को पब्लिक ट्रांसपोर्ट को और सशक्त करने की जरुरत है। इन सब के अलावा आपको यहाँ ये भी बताते चले की एनसीआर में हर रोज़ करीबन 10000 टन कूड़ा उत्पादित हो रहा है जिसमे से अधिकतर को आज भी जला कर निस्तांतरण किया जा रहा है। आप सब ने दिल्ली की करनाल बाईपास और ग़ाज़ीपुर लैंडफिल पर धूं धूं कर जलते हुए कूड़े की तस्वीरें देखि ही होंगी। तकनीक हमारे पास मजूद है। जरूरत है तो बस मंशा की वरना क्या मज़ाल की एक और तो हम करोड़ों की बुलेट ट्रैन जापान से ला रहे हैं और देश की राजधानी के कूड़े का इलाज करने के लिए बजट का अभाव है।


तो हम तो यही कहेंगे उन नेताओं से जो आज सिर्फ किसान पर ऊँगली उठा कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं की

दिल्ली की फिजाएं धुंआ धुंआ हैं

सरकारों के कान पर कोई रवां नहीं

लाइलाज सा हो चला है दर्दे शहर

हकीम कई हैं इसके, कोई दवा नहीं 

हम ये बिलकुल नहीं कह रहे की किसान जो खेतों में पराली जलाते हैं वो ठीक है और निश्चित ही कुछ समय के लिए ही सही पर ये भी आज दिल्ली पर छाए प्रदुषण का एक कारक है । हमारा बस इतना कहना है की सिर्फ पडोसी राज्य के किसान पर ऊँगली उठाने से विकास की दौड़ दौड़ रही हमारी राजधानी दिल्ली की समस्यायों का निपटारा हो जाता तो क्या ही बात थी तो कृपया नींद से जागें और सवच्छ दिल्ली के लिए साफ़ मंशा से हेलीकाप्टर से पानी छिड़कना छोड़ कर निचे उतर जमीं पर काम शुरू करें।