गांव गुहणा का अद्भुत दरवाजा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय स्थित धरोहर हरियाणा संग्रहालय को मिला

 

कहते हैं कुछ अलग करने की ललक अगर दिल में सवार हो जाए तो वो रातों को नींद नहीं आने देती। बात चाहे अभिनय की हो, साहित्य लेखन की हो, मिट्टी की मूर्तियां बनाने की  हो या फिर लकड़ी से बनाई जाने वाली किसी अन्य चीज की हो। दरअसल हरियाणा के कैथल जिले के गुहणा गांव में एक अनौखा लकड़ी का दरवाजा तैयार किया हुआ है जो देखने लायक है, लेकिन अब ये दरवाजा कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय में धरोहर की शोभा बढाएगा।

 

किसने बनवाया था दरवाजा 

बता दें कि इस दरवाजे को बनाने की शुरूआत स्व. चौ. जातीराम जी चहल पुत्र स्व. नौरंग राम चहल पुत्र लालचंद चहल, श्योचंद चहल जीतराम चहल, आभेराम चहल, चंदगी राम चहल ने सन 1951 ( संवत 1921 ) में की। मिस्त्री मुलाराम गांव सीशमर व उनका एक साथी दोनो ने मिलकर ये दरवाजा गेट लगभग 14 महीनो में बनाकर तैयार किया। उनकी मजदूरी देशी घी की रोटी व 5 रूपए प्रतिदिन के हिसाब से थी।

संग्रहालय प्रभारी ने डॉ. महासिंह पूनिया ने बताया कि यह दरवाजा अपने आप में अदभुत है। इस दरवाजे में 100 किलो से अधिक मेख लगाई गई हैं। इसके साथ ही दरवाजों के दोनों पल्लों पर राम लक्ष्मण, कृष्ण और लक्ष्मी की मूर्तियां भी उकेरी गई हैं। इसके अलावा शीशम से बने इस दरवाजे पर हरियाणवी लोक परंपरागत शैली में चित्रकारी भी लकड़ी की खुदाई में अंकित है।

दरवाजा भेंट करने आए संदीप नितीश चहल ने बताया कि यह दरवाजा 20वीं सदी के आरंभ में बनाया गया था। इस दरवाजे को गांव शीशमर के मूला राम मिस्त्री ने 14 महीने में तैयार किया था। उस समय उनकी मजदूरी देशी घी से सनी रोटी और पांच रुपए दिहाड़ी प्रतिदिन के हिसाब से दी गई थी। उन्होंने बताया कि दरवाजे को देखने के लिए दूर-दूर से लोग उनके घर आया करते थे। इसके साथ ही शुरू में जब यह दरवाजा बना तो बुजुर्गों ने छह महीने तक पर्दा लगाकर रखा था। हरियाणवी कलाकारी के अदभुत नमूने के रूप में यह दरवाजा हरियाणवी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। संग्रहालय के प्रभारी डॉ. महासिंह पूनिया ने केयू प्रशासन की ओर से जाति राम चहल के परिवार के आभे राम चहल, चंदगी राम चहल, जीत राम चहल श्योचंद चहल का आभार जताया और प्रशस्ति पत्र सौंपा।

 

क्या है धरोहर

धरोहर हरियाणा के कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरूक्षेत्र में बना एक संग्रहालय है जहां पौराणिक व पारंपरिक चीजों को रखा जाता है। आपको बता दें कि संग्रहालय निदेशक महासिंह पुनिया का इसके लिए खास योगदान रहा है। पुनिया अलग-अलग जगहों से पारंपरिक कारीगरी, बुनाई, कढाई एवं और भी कई सामान धरोहर के लिए उपलब्ध करवा चुके हैं।

जीवन परिचय; सूर्य कवि पंडित लखमीचंद और उनका हरयाणवी कविता संग्रह

पंडित लख्मीचंद का जन्म गांव जांटी कलां (सोनीपत) के एक सामान्य किसान परिवार में हुआ था। परिवार का निर्वाह बड़ी कठिनाई से होता था इसलिए बालक लखमी को पाठशाला भेजने का प्रश्न ही नही उठता। लखमी को घर के पशु चराने का काम सौंप दिया गया और वे एक पाळी का जीवन व्यतीत करने लगे। अन्य पाळियों से कुछ लोक गीत सुन सुन कर बालक लखमी को भी कुछ पंक्तियाँ याद हो गई। पशुओं को चराते-चराते लखमी भी कुछ न कुछ गुनगुनाता रहता।
इधर पशु चरते रहते, उधर लखमी अपनी धुन में रहता। धीरे-धीरे लखमी के गायन को मान्यता मिलने लगी। कुछ भजनी और सांगी उसे अपने साथ ले जाने लगे। परिवार वाले भी उनके इस शौक से चिंतित होने लगे लेकिन लखमी अपने गायन में मस्त रहे। एक बार गांव में कोई शादी थी और उस समय के प्रसिद्ध कवि और गायक मान सिंह का लखमी के गांव में आना हुआ। रातभर लखमी मंत्रमुग्ध हो मान सिंह के भजन सुनता रहा। लखमी उनसे इतना प्रभावित हुआ कि मन ही मन उसने उन्हें गुरु धारण कर लिया। तत्पश्चात् मान सिंह लखमी को संगीत की औपचारिक शिक्षा देने लगे। थोड़े ही समय में लखमी गायन कला में निपुण हो सूर्य की भांति चमकने लगे।
गायन में निपुणता प्राप्त करने के बाद लखमीचंद की अभिनय में रूचि पैदा हुई।  उस समय में अभिनय और सांग इत्यादि को अच्छा नहीं माना जाता था।  लखमी अपनी धुन के पक्के थे।  अब लखमी मेहंदीपुर के श्रीचंद सांगी की सांग मण्डली में सम्मिलित हो गए। फिर बाद में अपनी प्रतिभा को और निखारने के लिए सोहन कुंडलवाला के साथ काम करने लगे। कला निखारने हेतु लखमीचंद ने कई कलाकारों से सानिध्य रखा तथापि वे सदा मान सिंह को ही अपना गुरु मानते रहे।
अपनी गायन कला के दम पर न केवल हरियाणा में, बल्कि आसपास के राज्यों में भी रागनी को लोकप्रिय किया। बीस से अधिक सांगों की रचना की। नौटंकी और शाही लकड़हारा विशेष तौर पर प्रसिद्ध। हरियाणा के समाज और संस्कृति को बहुत गहरे से प्रभावित किया। सन् 1945 में देहांत। हरियाणा साहित्य अकादमी ने लखमीचंद ग्रंथावली प्रकाशित की है।

पं लखमीचंद की रागणियां


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

इस पृष्ठ पर हरियाणा के प्रसिद्ध रचनकारों की रागनियाँ उपलब्ध करवाई गई हैं।

हरियाणवी रागनियाँ

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जीवन परिचय; हरिचन्द और उनका हरयाणवी कविता संग्रह

 


जिला जींद में सफीदों के पास हाट गांव निवासी हरिचंद का जन्म 16 अक्टूबर 1941 को हुआ। गांव से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की। राज मिस्त्री का काम करते थे और आरा मशीन चलाते थे। सन् 1980 से वामपंथी आंदोलन से जुड़े और अपनी अंतिम सांस तक ( 11 मई 2010 ) जुड़े रहे। इनकी रागनियों में मार्क्सवादी दृष्टि का प्रभाव है। आर्थिक, सामाजिक, लैंगिक शोषण व भेदभाव के साथ श्रमिक आंदोलन के प्रति चिंताएं इनकी रागनियों के प्रमुख विषय हैं।


हरिचन्द की हरियाणवी रचनाएँ


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

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हरियाणवी रागनियाँ

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जीवन परिचय; हरीकेश पटवारी और उनका हरयाणवी कविता संग्रह

 


गांव धनौरी, जिला जींद के निवासी थे। रेडियो सिंगर। आजादी के बाद के हरियाणा के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक परिवेश को बहुत विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत करती रचनाएं। रचनाओं में व्यक्त सच्चाई और सहज कला के कारण रागनियां लोकप्रिय हुईं। वैराग्य रत्नमाला, प्रश्वोतरी, आजादी की झलक, हरिकेश पुष्पांजलि में रागनियां संकलित हैं। रचनाओं को देहाती बुक स्टोर नरवाना ने प्रकाशित किया है।


हरीकेश पटवारी की हरियाणवी रचनाएँ


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

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हरियाणवी रागनियाँ

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जीवन परिचय; ज्ञानी राम शास्त्री और उनका हरयाणवी कविता संग्रह

 

 


जींद जिले के गांव अलेवा में सन् 1923 में जन्म। भिवानी और अमृतसर से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। ओरियंटल कॉलेज, लाहौर से शास्त्री की परीक्षा पास करके लायलपुर चले गए। 1946 में सांप्रदायिक दंगों के कारण गांव अलेवा में आ गए। 1949 में लुधियाना में जयहिंद कॉलेज के स्थापना की। चालीस वर्षों तक अध्यापन किया। पाकिस्तान की पोल, नया जमाना, बखत के बोल, ज्ञान के हीरे मोती, वक्त की आवाज, किसान और मजदूर, आजादी का राज नामक हरियाणवी रचनाएं प्रकाशित हैं। रचनाओं को वाशिष्ट प्रकाशन, ज्ञान भवन, अलेवा, जींद के सौजन्य से प्रकाशित किया है।


 

ज्ञानी राम शास्त्री की हरियाणवी रचनाएँ


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

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जीवन परिचय; रणवीर सिंह दहिया और उनका हरयाणवी कविता संग्रह

 


जिला रोहतक के गांव बरोणा में 11 मार्च 1950 को जन्म। 1971 में एम. बी.बी.एस तथा 1977 में एम.एस की। सामाजिक बदलाव के कार्यों में नेतृव्य। हरियाणवी में कहानी एवं उपन्यास लेखन। समसामयिक विषयों और जन-नायकों पर सैंकड़ो रागनियां व किस्सों की रचना। मेहरसिंह, बाजे भगत, सफदर, उधम सिंह, आंडी सद्दाम, नया दौर विशेष तौर पर चर्चित। भगवद दयाल चिकित्सा विश्वविधालय, रोहतक में वरिष्ठ प्रोफेसर के पद पर कार्यरत।


रणवीर सिंह दहिया की रचनाएँ


संग्रह

  • किस्सा फौजी मेहर सिंह / रणवीर सिंह दहिया
  • किस्सा चन्द्रद्रशेखर आजाद / रणवीर सिंह दहिया
  • किस्सा 1857 / रणवीर सिंह दहिया
  • किस्सा अंडी सद्दाम / रणवीर सिंह दहिया
  • किस्सा झलकारी बाई / रणवीर सिंह दहिया
  • किस्सा ऊधम सिंह / रणवीर सिंह दहिया

हरियाणवी रचनाएँ


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

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हरियाणवी रागनियाँ

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लो हरियाणवी सिखो। हरियाणवी के कुछ शब्द।

 

लो हरियाणवी सिखो। हरियाणवी के कुछ शब्द।

Single—-राण्डा

Boy——-छोरा

Desi boy—मोल्लड़

Girl——-छोरी

Dirty girl-सुगली

Child—-बाळक

Young—-गाबरु/मलंग

Rope—जेवङी

Friend —-ढब्बी

Girlfriend-ढब्बण

Beautiful—सुथरी

Women—बिरबान्नी

Handsome–सुथरा

Biceps—कब्जे

Shoulders–खोवा

Bone—हाड

Enemy—बैरी

Noise—खुड़का/रोळा

Gussa —-छो

Majak—-मखोल

Bakwas–अळबाद

Love—लाड

Brother—बीर

Sister—भाण/बेब्बे

Back—पाछै

Thread—ताग्गा

Winter—जाड्डा

Cold air—शीळी बाळ

Fever—ताप

Blue-लील्ला

White—चिट्टा/धौळा

We—-आप्पा

Waiting—बाँट देखणा

Please wait–थम जा / थ्यावस कर

Deny–नाटणा

Different—न्यारा

Drama–खड़दू करना

Near—नेड़े / लौवै सी

Money—पीसे

Complain–उलहाणा

To remove—काढ़णा

With–गैल/गैल्ला

Strong—ठाड्डा

Bad—-भुंडा

Weak—–माड़ा

Rutba/hisab-टोहरा

Excuse me – हाड्डे सुण

Stair case—पैड़काळा

Eraser—मिटा दे

Hair—-लटूर

Garbage—अड़ंगा

Cloth—लत्ते

Jewellery—टूम ठेकरी

Dung cake–गोस्से/थेपड़ी

Rain—मीहं

Milk—डोक्का

Tea—चा

Boild gram(चने)–बाकळी

Butter milk—छा/शीत/लास्सी

Onion—गंठा

Garlic–लसण

Soap—साब्बण

Hot——-तात्ता

what——-के

Wall—-भीत

Blanket/रजाई–श्यौड

why——–क्या त/क्यूं

Naughty—–ऊत

Very naughty-अल्बादी/खपित्तर/कुब्बादी

How—क्यूक्कर

really – —–अरे हम्बै

Station——टेशन

Village—–गाम

Footwear—खौंसड़ा/छित्तर

whats up- –के होग्या

Fast fast-सैड सैड

Amazing—कसूत्ता//आखर/एंडी

Fast—-तावली/तग्गाजे त

Front—-शाहम्मी

Allmost done – कत्ती होग्या

Landlord—-*लम्बरदार*/*नम्बरदार*

Bilkul—निरोळ/जमा Copy_/रीस

Round —गेड़ा

Let him go – जान्न दै उसनै

i dont know–बेरा नी

More- -घणा

Smooth —- चीकणा

Tight—कैड़ा/करड़ा

Lady —— लुगाई

कसूर—-खोट

Ladai—रौला/खाड़े/राड़

Shout loud—रुक्के/किलकी

Pain—-भड़क

Father—– बाब्बू/बाप्पू

Drunked—भंड

To see—लखाना

Less—घाट

Mad—बावळा

mother —- माँ री

Slapping — जड़ दिया

Use less –गाड्डण जोग्गा

run away — भाज जा

stay here — याहडे/ थमजा

now ——– इभे

Meet/milna—फेटणा

not now—–इभी नी

Down—तलै

Body—गात

Ball—गिंड्डूं

Street—-गॉल

Pond—जोहड़

never——- कधे भी नी

Morning—तड़की/तड़के

AfterNoon—दपैेहरी

Wife ——– बहू

Fullfill demand-माँग पुगाणा

Husband—– बटेऊ/लोग/भर्तार/खसम

Sunlight —— घाम/चौंधा

salt ——— नूण

very——— भतेरा/घणा

gate——– कुवाड

Corner—कुण

Knee——– गोड्डा

Please Stop–थम जा /डट जा

Bat(चमगादड़)

Finger —— अंगली

animal- ——डांगर

ox- ———-बळद

Crow—काग

Buffalo son—-कटड़ा/काटडा

Human being—मानष

Happy—-राज्जी

Hide—-लुकणा

Return something—उल्टा मोड़ देना

Key—ताली

rat———-मूसा

Throw——बगाणा

Put——-टेक / धर

Like that —उसके बरगा

Hard work–खुभैेत

Type (तरह)—-जु/ढाल

Time—टेम/बखत

Somethimg went wrong—साक्का होगा

Inside—-भीत्तर

Skin—बक्कल

Tail—पुंजड़ जैसा——कैसा

Kasam–सूं

बात मान लेना—हम्बी भरना

रास्ता—राह

स्टाइल मारना-गिरकाणा

ज्यादा बनना -एंडी पाकना/माचणा

घूंघट—ओल्हा

कुछ—किम्मे

Stone—टोरड़ा

कितना—कतेक

रोटी—-टिक्कड़

जैसे–जणू/जुक्कर

किस टाइम—कोड़ बर

पिल्ला–कुतरु

Pagal है क्या—बावळी बूच है के

कम—घाट

ज्यादा–घणा

परेशान—बिराण

To cover face with cloth— ढाट्टा मारना

Dont be over smart—घणा चौधरी ना बण

Pareshan kar dena—बिराणमाट्टी

Person not doing according you—झकोई

Gazab kar diya—-चाले पाड़ दिए

दोस्तो हमने रक्षाबंधन तो मना लिया ! पर क्या ये जरूरी नहीं है कि जान लें कि रक्षा सूत्र का असल में क्या महत्व है!

रक्षा बंधन का त्यौहार आज के परिप्रेक्ष्य में

 

प्राचीन काल में रक्षा सूत्र का महत्व कुछ अलग प्रकार से था –
रानी राजा को रक्षा सूत्र बांधती थी जब वह शत्रु से युद्ध के लिए जाता था! इस रक्षा सूत्र को बांधकर रानी कामना करती थी कि राजा युद्ध में विजय प्राप्त करे ताकि वह उसकी (पत्नी) की जीवन भर रक्षा कर सके! उस समय शत्रु जब विजयी हो जाता था तो स्त्री जाति की हालत सबसे खराब हो जाती थी !पराजित राजा की रानी एवं अन्य महल की स्त्रियों के साथ बदसुलूकी की जाती थी! उनका यौन शोषण तक किया जाता था! इसीलिए अधिकतर पराजित राजा के परिवार की स्त्रियों को जब यह सूचना मिलती कि राजा युद्ध भूमि में मारा गया तो वह जौहर कर लेती थी!

प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार देवताओं और दानवो के बीच युद्ध चल रहा था जिसमे दानवो की ताकत देवताओं से कई गुना अधिक थी. देवता हर बाजी हारते दिखाई पड़ रहे थे. देवराज इंद्र के चेहरे पर भी संकट के बादल उमड़ पड़े थे. उनकी ऐसी स्थिती देख उनकी पत्नी इन्द्राणी भयभीत एवं चिंतित थी. इन्द्राणी धर्मपरायण नारी थी उन्होंने अपने पति की रक्षा हेतु घनघोर तप किया और उस तप से एक रक्षासूत्र उत्पन्न किया जिसे इन्द्राणी ने इंद्र की दाहिनी कलाई पर बांधा. वह दिन श्रावण की पूर्णिमा का दिन था. और उस दिन देवताओं की जीत हुई और इंद्र सही सलामत स्वर्गलोक आये. तब एक रक्षासूत्र पत्नी ने अपने पति को बांधा था!
रानी कर्मवती ने हुंमायूं को रक्षा सूत्र भिजवा कर अपने राज्य की रक्षा की अपेक्षा की थी और हुंमायूं ने रक्षा सूत्र का फर्ज अदा कर कर्मवती के राज्य को बचाया!
ब्रहाम्ण अपने राजा को बांधते थे ताकि राजा सदैव उनकी व प्रजाजन की रक्षा करे! रक्षा सूत्र बांधकर बहन अपने भाई से जीवन भर अपनी रक्षा करने की कामना करती थी कि उसका भाई उसकी रक्षा करेगा !ससुराल में भी अगरउसके साथ कुछ गलत घटता है तो भाई उसकी मदद करेगा !

नारी शारीरिक बल में पुरुषों से कमजोर होती हैं!इस कारण सुरक्षा की दृष्टी से इस सुंदर त्यौहार को बनाया गया पर कलयुग के दौर में परिपाठी बदलती ही जा रही हैं!यह परम्परा जो समाज में एक सहयोग के भाव के साथ उपजी थी सिर्फ भाई -बहन के नाम पर मात्र एक औपचारिक त्यौहार बनकर रह गयी है ! इसके सही मायने बदलते जा रहे हैं !
यह परम्परा सबसे पहले तो सिर्फ भाई -बहन पर आ कर सिमट गई है! इतने सीमित दायरे में इतनी शुभ परम्परा का सिमटना समाज के नैतिक विकास के लिए सही नहीं है! इतना ही नहीं आज बहन भाइयों को राखी बाँधती है और उम्मीद करती है कि भाई उसे अच्छा व कीमती सा तौहफा दे! अगर भाई परिस्थिति वश ऐसा नहीं कर पाता तो वह बहन के दिल से उतर जाता है! रही बात रक्षा की तो आज के वक्त में हर कोई भौतिकता की दौड़ में शामिल हों गए हैं! आज भाई के पास बहनों के पास बैठकर बात करने का भी वक्त नहीं है! त्यौहार के बहाने साल में एक दिन भाई बहन मिलते हैं! बहने भी रक्षा के बजाय मंहगा उपहार पाकर संतुष्ट है!
भौतिक दोड में शामिल भाई बहन कच्चे धागे के असल मूल्य को भूल चुके हैं! वर्ष में एक दिन के लिए प्यार जगता है जो राखी के मूल्य (कीमती राखी) और मंहगे तौहफों पर आ कर खत्म हो जाता है!

कुछ वाकये तो ऐसे सामने आते हैं कि जिससे मानवता भी शर्मसार हो जाती है!
गरीब बहन अगर दुखी है तो भाई पिंड छुडाते फिरते है डर रहता है कि बहन तकलीफ में है कुछ मदद न मांग ले! कहीं ऐसा हुआ तो धर्म संकट आ जाएगा!
रक्षा सूत्र के मूल्य को क्या समझेंगे ये लोग ? फिर रक्षाबंधन पर एक दिन के लिए रक्षा सूत्र का आदान प्रदान हो जाते हैं और हो गया रक्षाबंधन!
कहीं कहीं बहने भी भाई की पॉकेट देखकर उसी के साइज के आधार पर राखी खरीदती हैं!
इस तरह से इस परम्परा का निर्वहन हमारे समाज के लिए घातक है! हमें वापस पीछे मुड़कर देखना होगा! जो शुभ हो उसे पूर्णता के साथ अपनाना होगा! सुप्त परम्परा को जाग्रत करने की आवश्यकता है! कुछ परम्परायें जो समाज के भले में सहायक है उनके प्रति नव चेतना की आवश्यकता है!परम्परा में पुनः विस्तार करने की आवश्यकता है!
कई जगह पर पत्नी अपने पति को राखी बांधती हैं! पति अपनी पत्नी को रक्षा का वचन देता हैं!सही मायने में यह त्यौहार नारी के प्रति रक्षा की भावना को बढ़ाने के लिए बनाया गया हैं!समाज में नारी की स्थिती बहुत गंभीर हैं क्यूंकि यह त्यौहार अपने मूल अस्तित्व से दूर हटता जा रहा हैं! जरुरत हैं इस त्यौहार के सही मायने को समझे एवम अपने आस पास के सभी लोगो को समझायें!अपने बच्चो को इस लेन देन से हटकर इस त्यौहार की परम्परा समझायें तब ही आगे जाकर यह त्यौहार अपने एतिहासिक मूल को प्राप्त कर सकेगा!
अब आईए सही मायने में रक्षा सूत्र बांधने और बंधवाने का संकल्प लें केवल औपचारिकता पूरी करने के लिए नहीं!

– अमृता अंजुम

जीवन परिचय; बंसीलाल; हरियाणा के माने जाते हैं विकास पुरुष और लौह पुरुष


चौधरी बंसीलाल (जन्म- 26 अगस्त, 1927; मृत्यु- 28 मार्च, 2006)

श्री बंसीलाल; हरियाणा के भिवानी जिले के गोलागढ़ गांव के जाट परिवार में जन्मे इस हरियाणा के कद्दावर नेता को आज भी लोग सम्म्मान के साथ याद करते हैं। बंसीलाल का जन्म हरियाणा के भिवानी ज़िले में एक तत्कालीन लोहारू रियासत में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था बंसीलाल के पिता बच्चों की अधिक शिक्षा के पक्ष में नहीं थे। इसीलिए थोड़ी आरम्भिक शिक्षा के बाद 14 वर्ष की उम्र में ही बंसीलाल को अनाज के व्यापार में जोत दिया गया। पिता की अनुमति न मिलने पर भी बंसीलाल ने अध्ययन जारी रखा और 1952 तक प्राइवेट परीक्षाएँ देते हुए बी.ए. पास कर लिया। फिर उन्होंने 1956 में पंजाब विश्वविद्यालय से क़ानून की डिग्री ले ली। भिवानी में वकालत करते हुए बंसीलाल पिछड़े हुए किसानों के नेता बन गए। बंसीलाल ने कांग्रेस की अनेक स्थानीय समितियों में भी स्थान बना लिया और 31 मई 1968 को वह 41 वर्ष की आयु में सबसे कम उम्र के राज्य के मुख्यमंत्री बने, उस समय किसी ने भी, यहां तक कि उनके राजनितिक गुरुओं ने भी कल्पना नहीं की कि वह देश के सबसे शक्तिशाली राजनेताओं में से एक बन के उभरेंगे। उन्होंने हरियाणा के राजनीतिक परिदृश्य पर इतना ज्यादा प्रभाव डाला था कि वह समय समय पर नीचे जरूर जाते पर हरियाणा की राजनीती से कभी बहार नहीं हुए।

श्री बन्सी लाल जी के राजनीतिक जीवन को तीन चरणों में सारांशित किया जाता है। अपने मुखयमंत्री बनने के शुरुआती दिनों में ही उन्होंने राज्य के विकास, गांव गांव बिजली और सडकों का जाल बिछाने में अपना पूरा योगदान दिया। वह विकास में बुनियादी ढांचे के महत्व को समझने वाले पहले व्यक्ति थे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि हरियाणा आज गोवा में प्रति व्यक्ति आय के बाद दूसरे स्थान पर है। बेशक, दिल्ली से इसकी निकटता ने भी मदद की पर इस गुनी नेता ने हरियाणा की नीव बिछाने का काम बहुत पहले ही शुरू कर दिए था। राजनीतिक नतीजे चाहे जो भी हों , अगर उन्होंने सोचा कि कोई चीज उनके राज्य के हित में हैं तो  चार बार  हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे इस नेता ने अप्रिय निर्णय लेने से संकोच भी कभी नहीं किया।

उनके राजनीतिक जीवन के दूसरे चरण में केंद्र सरकार में उनकी भूमिका रही। । राजनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उनके कड़े व् सटीक तरीकों ने उन्हें सबसे पहले इंदिरा गांधी और बाद में संजय गांधी के करीब ला खड़ा किआ। केंद्र में एक मंत्री के रूप में उनकी भूमिका के बारे में लिखने के लिए बहुत ज़्यादा नहीं है, वहां उन्हें सिर्फ एक गाँधी परिवार के करीबी के रूप में पहचान मिली, जो हमेशा गाँधी परिवार के ठीक या गलत दोनों ही फैसलों में साथ खड़े दिखाई दिए. वह और संजय गांधी हमेशा आपातकाल राज में हुए कामों से जुड़े रहेंगे। बाद में राजीव गांधी के साथ खराब होते हुए रिश्तों की वजह से  राज्य की सक्रिय राजनीति में लौटे।

मुख्यमंत्री के रूप में अपने आखिरी कार्यकाल के दौरान, श्री बन्सी लाल ने 1996 में हरियाणा में शराब पर प्रतिबंध लगाकर सार्वजनिक क्रोध का सामना करना पड़ा । इसके मूल्य का भुगतान भी करना पड़ा और वे अगले बार हुए चुनाव में हार गए । ये उनका आखिरी चुनाव भी साबित हुआ क्यूंकि उन्होंने अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में करते हुए राजनितिक जीवन से सन्यास ले लिए व् राजनीती में अपनी संतान को आगे बढ़ाया। एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में उनके बेटे सुरेंद्र सिंह की अचानक मौत हो गई थी, जिस से न केवल उनकी राजनीतिक गणना में बल्कि उनके स्वास्थ्य में भी बड़ा झटका लगा। उनके कुछ दोषों अवदोषों को दूर रख दे तो, श्री बंसी लाल हरियाणा के इतिहास में  एक विकास पुरुष के रूप में सदैव जाने जाएंगे, जो विषम परिस्थितिओं में भी कड़े फैसले लेने से कभी नहीं चुके।

चौधरी बंसी लाल आजादी से पहले से ही राजनीति में सक्रिय थे। 1943-44 में लोहारू प्रजा मंडल के सेक्रेटरी थे।

चौधरी बंसी लाल 7 बार हरियाणा विधानसभा  से चुने गए । 1968 में वो पहली बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बने ।  वे भगवत दयाल शर्मा एवं राव बीरेंद्र सिंह के बाद हरियाणा के तीसरे मुख्यमंत्री थे। उनके कार्यकाल में हरियाणा  अपने सभी गाँवों में बिजली पहुंचाने वाला देश में पहला प्रदेश बना । देश के कुछ गाँवों में आज तक बिजली नहीं पहुंची है वहीँ हरियाणा के गाँवों में चौधरी बंसीलाल ने 1970 में बिजली पहुँचा दी थी । हरियाणा के गाँवों में सिंचाई का पानी लाने का श्रेय भी बंसीलाल को ही जाता है ।

1972 में वो दोबारा हरियाणा के मुख्यमंत्री बने नवम्बर ।

1975 में उन्हें भारत के रक्षामंत्री बनाया गया। आपातकाल के दौरान वो संजय गांधी के विश्वसनीय माने जाते थे । बंसीलाल को आपातकालइ लिये गए बहुत से विवादस्पद निर्णयो के लिये जिम्मेदार माना जाता है 1984 में वो रेलवे मंत्री भी बने

1986 में वे एक साल के लिये फिर हरियाणा के मुख्यमंत्री बने ।

1996 में उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर हरियाणा विकास पार्टी बनाई और 1997 मेंबीजेपी गठबंधन के साथ हरियाणा में शराबबंदी के वादे के साथ सरकार  बनाई । प्रदेश में शराब बंदी पूर्ण रूप से असफल रही । जुलाई 99 में बीजेपी ने अपना समर्थन इनलो को देकर सरकार गिरा दी । 2005 में हविपा का कांग्रेस में विलय हो गया ।

2005 में उनके पुत्र और राजनैतिक उत्तराधिकारी सुरेन्द्र सिंह की हवाई दुर्घटना में मौत हो जाने से वो टूट गए और  28 मार्च 2006 को उनका भी निधन हो गया ।

बंसीलाल की 28 मार्च 2006 को नई दिल्ली में मृत्यु हो गई। वे कुछ समय से बीमार थे।

चौधरी बंसी लाल के बड़े बेटे चौधरी रणबीर सिंह महेंद्र, बीसीसीआई (BCCI) के  पूर्व अध्यक्ष हैं एवं चौधरी बंसीलाल के ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते, उन्हें स्वाभाविक रूप से चौधरी बंसीलाल की राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी देखा जाता है।

चौ.बंसी लाल बहुत ही सख्त किस्म के इंसान थे | उनके किस्से आज भी गाँव देहात में सुन ने को मिल जाते हैं। भिवानी में लोग उन्हें बाऊ जी बुलाते थे | कोठी में उनका इतना खौफ था की जब वो बाहर निकलते थे तो वहा बैठे वर्कर कुण टोह्नी शुरू कर दिया करते | ऐसे अनाड़ी थे की पड़ोस में खुद की पोती का ब्याह था पर खुद कन्यादान करन नहीं गए | एक बार जो फैसला ले लेते थे उससे पीछे नहीं हटते थे | 99 में सरकार जाने के बाद एक बार जींद में रैली करी थी विकास पार्टी ने , रैली से पहले सुरेंदर सिंह ने कहीं पत्रकारों से कह दिया की अगर हमारी सरकार दुबारा आई तो हम बिजली के बिल मांफ कर देंगे , जब यह बात पत्रकारों ने चौ.बंसी लाल से पूछी तो चौ.साहब ने कहा की ” सुरेंदर सी.एम बनेगा तो कर देगा पर चौ.बंसी लाल तो करे कोणी ” |
बिजली के बिलों पर लोहारू बाढ़ड़ा में किसानो ने खूब बवाल मचाया , इन बिलों के चक्कर में चौ.भजन लाल सरकार में कादमा काण्ड हुआ कई किसान शहीद हुए …इस चक्कर में 96 में कांग्रेस बुरी तरह हार गई और विकास पार्टी की सरकार में आ गई …चौ.बसी लाल की सरकार बनने के बाद फिर यह बिलों वाला मुद्दा उठा तो चौ.बंसी लाल ने बाढ़ड़ा में एक रैली में कहा की बिल भर देना नहीं तो मुझे भरवाने भी आते हैं ..ताहरे डोगे अर्र खंडुए झाड़िआं के टंगवा द्यूंगा नही भरे तो ….ऐसे बेबाक हरियाणवी नेता थे चौधरी बंसी लाल।

उन्हें भाषण बाजी कम ही पसंद थी , जैसा की चौटाला साहब अपने भाषण में सबको इज्जत देते हैं चौ.बंसी लाल जी इसके जम्मा उलटे थे ….एक बार 97 की बात है लोहारू में रैली थी…..उन्होंने चौटाला साहब पर एक व्यंग कसा की इस चौटाला ने अपनी माँ के पेट में त लिकड़न में 24 घंटे लगा दिए थे , इसकी माँ बहुत रोई …इसकी माँ ने रोती देख दाई बोली के बावली इबे तो तू रोवे स आगे आगे इसने पूरा हरियाणा रोवेगा …..और आखिर में बोले के भाई शास्त्रों में लिखा हैं की जिस राज्य का राजा अपंग हो वो राज्य विकास नहीं कर सकता उसका नास ही होगा , एक लंगड़ा स और दूसरा काणा (भजन लाल ) स तो सोच समझ के फैसला करियो ……..

ऐसे कई किस्से स चौ.बंसी लाल जी के ……….

तोशाम व भिवानी का इलाका और बंसीलाल एक दूसरे के पर्याय यूं ही नहीं बने, दोनों के बीच करीब चार दशक का गहरा राजनीतिक संबंध रहा। इस धरती से जीत कर बंसीलाल ने लगभग 12 साल प्रदेश की बागडोर संभाली। तोशाम विधानसभा से बंसीलाल कुल छह बार चुनाव लड़े और सभी जीते। वहां आज भी उनके नाम पे कई कॉलेज व् पॉलिटेक्निक खोले गए हैं। इसके अलावा आज भी उनकी राजनितिक विरासत को बरक़रार रखते हुए बंसी लाल की पोती श्रुति चौधरी कांग्रेस से भिवानी की सांसद हैं।

जीवन परिचय; अनीता कुंडू; एक बार नहीं दो बार माउंट एवेरेस्ट चढ़ने वाली बनी पहली भारतीय महिला

हरियाणा पुलिस में कार्यरत अनिता कुंडु बनी चीन की ओर से माउंट एवरेस्ट चढ़ने वाली पहली भारतीय महिला

 

अनीता कुंडू चाइना व नेपाल दोनों रास्तों से माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली भारतीय महिला बन चुकी हैं। दुनिया की सबसे मुश्किल पर्वत श्रंखलाएं भी इस हरियाणा की इस धाकड़ छोरी का रास्ता रोक नहीं पाईं, उसने चीन की तरफ से चढ़ाई कर दुनिया के सबसे ऊँचे पर्वत शिखर पर तिरंगा फहराया है।

कुंडू, जो हिसार की नवदीप काॅलोनी में रहती हैं  मूलरूप से फरीदपुर गांव की रहने वाली हैं। उन्होंने 11 अप्रैल 2017 को अपना अभियान शुरू किया, लेकिन चढ़ाई के दौरान जल्द ही उनसे संपर्क टूट गया। 20 अप्रैल को, यह ख़बर आयी  कि वह शिखर से कुछ 1,100 मीटर की दूरी पर थी और अगले दिन, उन्होंने माउंट एवेरेस्ट पर भारतीय ध्वज फहराया। वह दो साल पहले भी इसी रास्ते से चढ़ाई करने गई थी, मगर भूकंप आने की वजह से मिशन बीच में छोड़कर लौटना पड़ा था। उसने हार नहीं मानी, जिद थी कि बाधाओं को रौंदकर चढ़ना है। आखिरकार दूसरे प्रयास में उसने 8848 मीटर की ऊंचाई पर पहुंचकर पूरी दुनिया में देश का नाम रोशन किया है। अनीता से पहले हरियाणा की संतोष यादव और ममता सौदा भी एवरेस्ट पर तिरंगा फरहा चुकी हैं। संतोष यादव रेवाड़ी से हैं और उन्हें बचपन से ही पहाड़ बहुत लुभावने लगते थे। वैसे एवरेस्ट पर चढ़ते समय ही शायद जिंदगी में सांसों का मोल पता चलता हो। एवरेस्ट पर सबसे पहले हिलेरी और तेनसिंध ने कदम रखे थे। तेनसिंध एक शेरपा थे और पर्वतारोही दल में सहायक के रूप में शामिल थे। आखिर हिलेरी के साथ वही चोटी तक पहुंच सके। खैर, एवरेस्ट की कहानी फिर सही।

8 में से 5 ने बीच में छोड़ दिया था सफर
अनीता के दल में 8 पर्वतारोही थे, लेकिन आखिरी पड़ाव पर आते-आते सिर्फ 3 ही रह गए थे। अन्य 5 ने अपने सफर को बीच में ही रोक दिया और वापस आ गए। इसके बाद अंतिम पड़ाव पर एक विदेशी पर्वतारोही की मौत हो गई। जिससे अंतिम पड़ाव में सिर्फ अनिता व एक अन्य विदेशी पर्वतारोही ही रह गए थे।

वर्ष 2008 में अनीता हरियाणा पुलिस में कांस्टेबल के पद पर भर्ती हुई। 2011 में उन्होंने लेह-लद्दाख की 22 हजार फीट ऊंची चोटी पर चढ़ाई की। 2011 में ही अनीता ने उत्तराखंड की सतोपंथ की 23 हजार फीट ऊंची चोटी पर चढ़ाई की। इसके बाद अनीता ने नेपाल के रास्ते से 18 मई 2013 को एवरेस्ट पर तिरंगा फहराया। वर्ष 2015 में अनीता चाइना की ओर से एवरेस्ट फतेह करने के लिए गई। भूकंप के कारण चाइना सरकार ने अभियान बीच में ही रद्द करा दिया था।


हिसार, हरियाणा और भारत का गौरव अनीता कुंडू ने बढ़ा दिया। आईये सुनते हैं अनीता से ही क्यों और कैसे उन्होंने ये चुनौती स्वीकार की व् उन्हें किन किन मुश्किलों से झूझना पड़ा। पुरस्कार या पैसे लिए कोई एवरेस्ट पर नहीं चढ़ता। यह तो एक जुनून होता है। इस जुनून और जज्बे को सलाम, अनीता कुंडू।