जीवन परिचय; सूर्य कवि पंडित लखमीचंद और उनका हरयाणवी कविता संग्रह

पंडित लख्मीचंद का जन्म गांव जांटी कलां (सोनीपत) के एक सामान्य किसान परिवार में हुआ था। परिवार का निर्वाह बड़ी कठिनाई से होता था इसलिए बालक लखमी को पाठशाला भेजने का प्रश्न ही नही उठता। लखमी को घर के पशु चराने का काम सौंप दिया गया और वे एक पाळी का जीवन व्यतीत करने लगे। अन्य पाळियों से कुछ लोक गीत सुन सुन कर बालक लखमी को भी कुछ पंक्तियाँ याद हो गई। पशुओं को चराते-चराते लखमी भी कुछ न कुछ गुनगुनाता रहता।
इधर पशु चरते रहते, उधर लखमी अपनी धुन में रहता। धीरे-धीरे लखमी के गायन को मान्यता मिलने लगी। कुछ भजनी और सांगी उसे अपने साथ ले जाने लगे। परिवार वाले भी उनके इस शौक से चिंतित होने लगे लेकिन लखमी अपने गायन में मस्त रहे। एक बार गांव में कोई शादी थी और उस समय के प्रसिद्ध कवि और गायक मान सिंह का लखमी के गांव में आना हुआ। रातभर लखमी मंत्रमुग्ध हो मान सिंह के भजन सुनता रहा। लखमी उनसे इतना प्रभावित हुआ कि मन ही मन उसने उन्हें गुरु धारण कर लिया। तत्पश्चात् मान सिंह लखमी को संगीत की औपचारिक शिक्षा देने लगे। थोड़े ही समय में लखमी गायन कला में निपुण हो सूर्य की भांति चमकने लगे।
गायन में निपुणता प्राप्त करने के बाद लखमीचंद की अभिनय में रूचि पैदा हुई।  उस समय में अभिनय और सांग इत्यादि को अच्छा नहीं माना जाता था।  लखमी अपनी धुन के पक्के थे।  अब लखमी मेहंदीपुर के श्रीचंद सांगी की सांग मण्डली में सम्मिलित हो गए। फिर बाद में अपनी प्रतिभा को और निखारने के लिए सोहन कुंडलवाला के साथ काम करने लगे। कला निखारने हेतु लखमीचंद ने कई कलाकारों से सानिध्य रखा तथापि वे सदा मान सिंह को ही अपना गुरु मानते रहे।
अपनी गायन कला के दम पर न केवल हरियाणा में, बल्कि आसपास के राज्यों में भी रागनी को लोकप्रिय किया। बीस से अधिक सांगों की रचना की। नौटंकी और शाही लकड़हारा विशेष तौर पर प्रसिद्ध। हरियाणा के समाज और संस्कृति को बहुत गहरे से प्रभावित किया। सन् 1945 में देहांत। हरियाणा साहित्य अकादमी ने लखमीचंद ग्रंथावली प्रकाशित की है।

पं लखमीचंद की रागणियां


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

इस पृष्ठ पर हरियाणा के प्रसिद्ध रचनकारों की रागनियाँ उपलब्ध करवाई गई हैं।

हरियाणवी रागनियाँ

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जीवन परिचय; हरिचन्द और उनका हरयाणवी कविता संग्रह

 


जिला जींद में सफीदों के पास हाट गांव निवासी हरिचंद का जन्म 16 अक्टूबर 1941 को हुआ। गांव से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की। राज मिस्त्री का काम करते थे और आरा मशीन चलाते थे। सन् 1980 से वामपंथी आंदोलन से जुड़े और अपनी अंतिम सांस तक ( 11 मई 2010 ) जुड़े रहे। इनकी रागनियों में मार्क्सवादी दृष्टि का प्रभाव है। आर्थिक, सामाजिक, लैंगिक शोषण व भेदभाव के साथ श्रमिक आंदोलन के प्रति चिंताएं इनकी रागनियों के प्रमुख विषय हैं।


हरिचन्द की हरियाणवी रचनाएँ


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

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जीवन परिचय; हरीकेश पटवारी और उनका हरयाणवी कविता संग्रह

 


गांव धनौरी, जिला जींद के निवासी थे। रेडियो सिंगर। आजादी के बाद के हरियाणा के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक परिवेश को बहुत विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत करती रचनाएं। रचनाओं में व्यक्त सच्चाई और सहज कला के कारण रागनियां लोकप्रिय हुईं। वैराग्य रत्नमाला, प्रश्वोतरी, आजादी की झलक, हरिकेश पुष्पांजलि में रागनियां संकलित हैं। रचनाओं को देहाती बुक स्टोर नरवाना ने प्रकाशित किया है।


हरीकेश पटवारी की हरियाणवी रचनाएँ


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

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जीवन परिचय; ज्ञानी राम शास्त्री और उनका हरयाणवी कविता संग्रह

 

 


जींद जिले के गांव अलेवा में सन् 1923 में जन्म। भिवानी और अमृतसर से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। ओरियंटल कॉलेज, लाहौर से शास्त्री की परीक्षा पास करके लायलपुर चले गए। 1946 में सांप्रदायिक दंगों के कारण गांव अलेवा में आ गए। 1949 में लुधियाना में जयहिंद कॉलेज के स्थापना की। चालीस वर्षों तक अध्यापन किया। पाकिस्तान की पोल, नया जमाना, बखत के बोल, ज्ञान के हीरे मोती, वक्त की आवाज, किसान और मजदूर, आजादी का राज नामक हरियाणवी रचनाएं प्रकाशित हैं। रचनाओं को वाशिष्ट प्रकाशन, ज्ञान भवन, अलेवा, जींद के सौजन्य से प्रकाशित किया है।


 

ज्ञानी राम शास्त्री की हरियाणवी रचनाएँ


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

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जीवन परिचय; रणवीर सिंह दहिया और उनका हरयाणवी कविता संग्रह

 


जिला रोहतक के गांव बरोणा में 11 मार्च 1950 को जन्म। 1971 में एम. बी.बी.एस तथा 1977 में एम.एस की। सामाजिक बदलाव के कार्यों में नेतृव्य। हरियाणवी में कहानी एवं उपन्यास लेखन। समसामयिक विषयों और जन-नायकों पर सैंकड़ो रागनियां व किस्सों की रचना। मेहरसिंह, बाजे भगत, सफदर, उधम सिंह, आंडी सद्दाम, नया दौर विशेष तौर पर चर्चित। भगवद दयाल चिकित्सा विश्वविधालय, रोहतक में वरिष्ठ प्रोफेसर के पद पर कार्यरत।


रणवीर सिंह दहिया की रचनाएँ


संग्रह

  • किस्सा फौजी मेहर सिंह / रणवीर सिंह दहिया
  • किस्सा चन्द्रद्रशेखर आजाद / रणवीर सिंह दहिया
  • किस्सा 1857 / रणवीर सिंह दहिया
  • किस्सा अंडी सद्दाम / रणवीर सिंह दहिया
  • किस्सा झलकारी बाई / रणवीर सिंह दहिया
  • किस्सा ऊधम सिंह / रणवीर सिंह दहिया

हरियाणवी रचनाएँ


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

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जीवन परिचय; बंसीलाल; हरियाणा के माने जाते हैं विकास पुरुष और लौह पुरुष


चौधरी बंसीलाल (जन्म- 26 अगस्त, 1927; मृत्यु- 28 मार्च, 2006)

श्री बंसीलाल; हरियाणा के भिवानी जिले के गोलागढ़ गांव के जाट परिवार में जन्मे इस हरियाणा के कद्दावर नेता को आज भी लोग सम्म्मान के साथ याद करते हैं। बंसीलाल का जन्म हरियाणा के भिवानी ज़िले में एक तत्कालीन लोहारू रियासत में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था बंसीलाल के पिता बच्चों की अधिक शिक्षा के पक्ष में नहीं थे। इसीलिए थोड़ी आरम्भिक शिक्षा के बाद 14 वर्ष की उम्र में ही बंसीलाल को अनाज के व्यापार में जोत दिया गया। पिता की अनुमति न मिलने पर भी बंसीलाल ने अध्ययन जारी रखा और 1952 तक प्राइवेट परीक्षाएँ देते हुए बी.ए. पास कर लिया। फिर उन्होंने 1956 में पंजाब विश्वविद्यालय से क़ानून की डिग्री ले ली। भिवानी में वकालत करते हुए बंसीलाल पिछड़े हुए किसानों के नेता बन गए। बंसीलाल ने कांग्रेस की अनेक स्थानीय समितियों में भी स्थान बना लिया और 31 मई 1968 को वह 41 वर्ष की आयु में सबसे कम उम्र के राज्य के मुख्यमंत्री बने, उस समय किसी ने भी, यहां तक कि उनके राजनितिक गुरुओं ने भी कल्पना नहीं की कि वह देश के सबसे शक्तिशाली राजनेताओं में से एक बन के उभरेंगे। उन्होंने हरियाणा के राजनीतिक परिदृश्य पर इतना ज्यादा प्रभाव डाला था कि वह समय समय पर नीचे जरूर जाते पर हरियाणा की राजनीती से कभी बहार नहीं हुए।

श्री बन्सी लाल जी के राजनीतिक जीवन को तीन चरणों में सारांशित किया जाता है। अपने मुखयमंत्री बनने के शुरुआती दिनों में ही उन्होंने राज्य के विकास, गांव गांव बिजली और सडकों का जाल बिछाने में अपना पूरा योगदान दिया। वह विकास में बुनियादी ढांचे के महत्व को समझने वाले पहले व्यक्ति थे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि हरियाणा आज गोवा में प्रति व्यक्ति आय के बाद दूसरे स्थान पर है। बेशक, दिल्ली से इसकी निकटता ने भी मदद की पर इस गुनी नेता ने हरियाणा की नीव बिछाने का काम बहुत पहले ही शुरू कर दिए था। राजनीतिक नतीजे चाहे जो भी हों , अगर उन्होंने सोचा कि कोई चीज उनके राज्य के हित में हैं तो  चार बार  हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे इस नेता ने अप्रिय निर्णय लेने से संकोच भी कभी नहीं किया।

उनके राजनीतिक जीवन के दूसरे चरण में केंद्र सरकार में उनकी भूमिका रही। । राजनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उनके कड़े व् सटीक तरीकों ने उन्हें सबसे पहले इंदिरा गांधी और बाद में संजय गांधी के करीब ला खड़ा किआ। केंद्र में एक मंत्री के रूप में उनकी भूमिका के बारे में लिखने के लिए बहुत ज़्यादा नहीं है, वहां उन्हें सिर्फ एक गाँधी परिवार के करीबी के रूप में पहचान मिली, जो हमेशा गाँधी परिवार के ठीक या गलत दोनों ही फैसलों में साथ खड़े दिखाई दिए. वह और संजय गांधी हमेशा आपातकाल राज में हुए कामों से जुड़े रहेंगे। बाद में राजीव गांधी के साथ खराब होते हुए रिश्तों की वजह से  राज्य की सक्रिय राजनीति में लौटे।

मुख्यमंत्री के रूप में अपने आखिरी कार्यकाल के दौरान, श्री बन्सी लाल ने 1996 में हरियाणा में शराब पर प्रतिबंध लगाकर सार्वजनिक क्रोध का सामना करना पड़ा । इसके मूल्य का भुगतान भी करना पड़ा और वे अगले बार हुए चुनाव में हार गए । ये उनका आखिरी चुनाव भी साबित हुआ क्यूंकि उन्होंने अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में करते हुए राजनितिक जीवन से सन्यास ले लिए व् राजनीती में अपनी संतान को आगे बढ़ाया। एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में उनके बेटे सुरेंद्र सिंह की अचानक मौत हो गई थी, जिस से न केवल उनकी राजनीतिक गणना में बल्कि उनके स्वास्थ्य में भी बड़ा झटका लगा। उनके कुछ दोषों अवदोषों को दूर रख दे तो, श्री बंसी लाल हरियाणा के इतिहास में  एक विकास पुरुष के रूप में सदैव जाने जाएंगे, जो विषम परिस्थितिओं में भी कड़े फैसले लेने से कभी नहीं चुके।

चौधरी बंसी लाल आजादी से पहले से ही राजनीति में सक्रिय थे। 1943-44 में लोहारू प्रजा मंडल के सेक्रेटरी थे।

चौधरी बंसी लाल 7 बार हरियाणा विधानसभा  से चुने गए । 1968 में वो पहली बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बने ।  वे भगवत दयाल शर्मा एवं राव बीरेंद्र सिंह के बाद हरियाणा के तीसरे मुख्यमंत्री थे। उनके कार्यकाल में हरियाणा  अपने सभी गाँवों में बिजली पहुंचाने वाला देश में पहला प्रदेश बना । देश के कुछ गाँवों में आज तक बिजली नहीं पहुंची है वहीँ हरियाणा के गाँवों में चौधरी बंसीलाल ने 1970 में बिजली पहुँचा दी थी । हरियाणा के गाँवों में सिंचाई का पानी लाने का श्रेय भी बंसीलाल को ही जाता है ।

1972 में वो दोबारा हरियाणा के मुख्यमंत्री बने नवम्बर ।

1975 में उन्हें भारत के रक्षामंत्री बनाया गया। आपातकाल के दौरान वो संजय गांधी के विश्वसनीय माने जाते थे । बंसीलाल को आपातकालइ लिये गए बहुत से विवादस्पद निर्णयो के लिये जिम्मेदार माना जाता है 1984 में वो रेलवे मंत्री भी बने

1986 में वे एक साल के लिये फिर हरियाणा के मुख्यमंत्री बने ।

1996 में उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर हरियाणा विकास पार्टी बनाई और 1997 मेंबीजेपी गठबंधन के साथ हरियाणा में शराबबंदी के वादे के साथ सरकार  बनाई । प्रदेश में शराब बंदी पूर्ण रूप से असफल रही । जुलाई 99 में बीजेपी ने अपना समर्थन इनलो को देकर सरकार गिरा दी । 2005 में हविपा का कांग्रेस में विलय हो गया ।

2005 में उनके पुत्र और राजनैतिक उत्तराधिकारी सुरेन्द्र सिंह की हवाई दुर्घटना में मौत हो जाने से वो टूट गए और  28 मार्च 2006 को उनका भी निधन हो गया ।

बंसीलाल की 28 मार्च 2006 को नई दिल्ली में मृत्यु हो गई। वे कुछ समय से बीमार थे।

चौधरी बंसी लाल के बड़े बेटे चौधरी रणबीर सिंह महेंद्र, बीसीसीआई (BCCI) के  पूर्व अध्यक्ष हैं एवं चौधरी बंसीलाल के ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते, उन्हें स्वाभाविक रूप से चौधरी बंसीलाल की राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी देखा जाता है।

चौ.बंसी लाल बहुत ही सख्त किस्म के इंसान थे | उनके किस्से आज भी गाँव देहात में सुन ने को मिल जाते हैं। भिवानी में लोग उन्हें बाऊ जी बुलाते थे | कोठी में उनका इतना खौफ था की जब वो बाहर निकलते थे तो वहा बैठे वर्कर कुण टोह्नी शुरू कर दिया करते | ऐसे अनाड़ी थे की पड़ोस में खुद की पोती का ब्याह था पर खुद कन्यादान करन नहीं गए | एक बार जो फैसला ले लेते थे उससे पीछे नहीं हटते थे | 99 में सरकार जाने के बाद एक बार जींद में रैली करी थी विकास पार्टी ने , रैली से पहले सुरेंदर सिंह ने कहीं पत्रकारों से कह दिया की अगर हमारी सरकार दुबारा आई तो हम बिजली के बिल मांफ कर देंगे , जब यह बात पत्रकारों ने चौ.बंसी लाल से पूछी तो चौ.साहब ने कहा की ” सुरेंदर सी.एम बनेगा तो कर देगा पर चौ.बंसी लाल तो करे कोणी ” |
बिजली के बिलों पर लोहारू बाढ़ड़ा में किसानो ने खूब बवाल मचाया , इन बिलों के चक्कर में चौ.भजन लाल सरकार में कादमा काण्ड हुआ कई किसान शहीद हुए …इस चक्कर में 96 में कांग्रेस बुरी तरह हार गई और विकास पार्टी की सरकार में आ गई …चौ.बसी लाल की सरकार बनने के बाद फिर यह बिलों वाला मुद्दा उठा तो चौ.बंसी लाल ने बाढ़ड़ा में एक रैली में कहा की बिल भर देना नहीं तो मुझे भरवाने भी आते हैं ..ताहरे डोगे अर्र खंडुए झाड़िआं के टंगवा द्यूंगा नही भरे तो ….ऐसे बेबाक हरियाणवी नेता थे चौधरी बंसी लाल।

उन्हें भाषण बाजी कम ही पसंद थी , जैसा की चौटाला साहब अपने भाषण में सबको इज्जत देते हैं चौ.बंसी लाल जी इसके जम्मा उलटे थे ….एक बार 97 की बात है लोहारू में रैली थी…..उन्होंने चौटाला साहब पर एक व्यंग कसा की इस चौटाला ने अपनी माँ के पेट में त लिकड़न में 24 घंटे लगा दिए थे , इसकी माँ बहुत रोई …इसकी माँ ने रोती देख दाई बोली के बावली इबे तो तू रोवे स आगे आगे इसने पूरा हरियाणा रोवेगा …..और आखिर में बोले के भाई शास्त्रों में लिखा हैं की जिस राज्य का राजा अपंग हो वो राज्य विकास नहीं कर सकता उसका नास ही होगा , एक लंगड़ा स और दूसरा काणा (भजन लाल ) स तो सोच समझ के फैसला करियो ……..

ऐसे कई किस्से स चौ.बंसी लाल जी के ……….

तोशाम व भिवानी का इलाका और बंसीलाल एक दूसरे के पर्याय यूं ही नहीं बने, दोनों के बीच करीब चार दशक का गहरा राजनीतिक संबंध रहा। इस धरती से जीत कर बंसीलाल ने लगभग 12 साल प्रदेश की बागडोर संभाली। तोशाम विधानसभा से बंसीलाल कुल छह बार चुनाव लड़े और सभी जीते। वहां आज भी उनके नाम पे कई कॉलेज व् पॉलिटेक्निक खोले गए हैं। इसके अलावा आज भी उनकी राजनितिक विरासत को बरक़रार रखते हुए बंसी लाल की पोती श्रुति चौधरी कांग्रेस से भिवानी की सांसद हैं।

जीवन परिचय; अनीता कुंडू; एक बार नहीं दो बार माउंट एवेरेस्ट चढ़ने वाली बनी पहली भारतीय महिला

हरियाणा पुलिस में कार्यरत अनिता कुंडु बनी चीन की ओर से माउंट एवरेस्ट चढ़ने वाली पहली भारतीय महिला

 

अनीता कुंडू चाइना व नेपाल दोनों रास्तों से माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली भारतीय महिला बन चुकी हैं। दुनिया की सबसे मुश्किल पर्वत श्रंखलाएं भी इस हरियाणा की इस धाकड़ छोरी का रास्ता रोक नहीं पाईं, उसने चीन की तरफ से चढ़ाई कर दुनिया के सबसे ऊँचे पर्वत शिखर पर तिरंगा फहराया है।

कुंडू, जो हिसार की नवदीप काॅलोनी में रहती हैं  मूलरूप से फरीदपुर गांव की रहने वाली हैं। उन्होंने 11 अप्रैल 2017 को अपना अभियान शुरू किया, लेकिन चढ़ाई के दौरान जल्द ही उनसे संपर्क टूट गया। 20 अप्रैल को, यह ख़बर आयी  कि वह शिखर से कुछ 1,100 मीटर की दूरी पर थी और अगले दिन, उन्होंने माउंट एवेरेस्ट पर भारतीय ध्वज फहराया। वह दो साल पहले भी इसी रास्ते से चढ़ाई करने गई थी, मगर भूकंप आने की वजह से मिशन बीच में छोड़कर लौटना पड़ा था। उसने हार नहीं मानी, जिद थी कि बाधाओं को रौंदकर चढ़ना है। आखिरकार दूसरे प्रयास में उसने 8848 मीटर की ऊंचाई पर पहुंचकर पूरी दुनिया में देश का नाम रोशन किया है। अनीता से पहले हरियाणा की संतोष यादव और ममता सौदा भी एवरेस्ट पर तिरंगा फरहा चुकी हैं। संतोष यादव रेवाड़ी से हैं और उन्हें बचपन से ही पहाड़ बहुत लुभावने लगते थे। वैसे एवरेस्ट पर चढ़ते समय ही शायद जिंदगी में सांसों का मोल पता चलता हो। एवरेस्ट पर सबसे पहले हिलेरी और तेनसिंध ने कदम रखे थे। तेनसिंध एक शेरपा थे और पर्वतारोही दल में सहायक के रूप में शामिल थे। आखिर हिलेरी के साथ वही चोटी तक पहुंच सके। खैर, एवरेस्ट की कहानी फिर सही।

8 में से 5 ने बीच में छोड़ दिया था सफर
अनीता के दल में 8 पर्वतारोही थे, लेकिन आखिरी पड़ाव पर आते-आते सिर्फ 3 ही रह गए थे। अन्य 5 ने अपने सफर को बीच में ही रोक दिया और वापस आ गए। इसके बाद अंतिम पड़ाव पर एक विदेशी पर्वतारोही की मौत हो गई। जिससे अंतिम पड़ाव में सिर्फ अनिता व एक अन्य विदेशी पर्वतारोही ही रह गए थे।

वर्ष 2008 में अनीता हरियाणा पुलिस में कांस्टेबल के पद पर भर्ती हुई। 2011 में उन्होंने लेह-लद्दाख की 22 हजार फीट ऊंची चोटी पर चढ़ाई की। 2011 में ही अनीता ने उत्तराखंड की सतोपंथ की 23 हजार फीट ऊंची चोटी पर चढ़ाई की। इसके बाद अनीता ने नेपाल के रास्ते से 18 मई 2013 को एवरेस्ट पर तिरंगा फहराया। वर्ष 2015 में अनीता चाइना की ओर से एवरेस्ट फतेह करने के लिए गई। भूकंप के कारण चाइना सरकार ने अभियान बीच में ही रद्द करा दिया था।


हिसार, हरियाणा और भारत का गौरव अनीता कुंडू ने बढ़ा दिया। आईये सुनते हैं अनीता से ही क्यों और कैसे उन्होंने ये चुनौती स्वीकार की व् उन्हें किन किन मुश्किलों से झूझना पड़ा। पुरस्कार या पैसे लिए कोई एवरेस्ट पर नहीं चढ़ता। यह तो एक जुनून होता है। इस जुनून और जज्बे को सलाम, अनीता कुंडू।


जीवन परिचय; योगेश्वर दत्त; आखिर क्या बात थी कि मात्र 8 साल का बच्चा सबकुछ छोड़कर पहलवानी में कूद पड़ा

यदि यूं कहें कि हरियाणा में पहलवानों का खजाना है, तो गलत नहीं होगा। सुशील कुमार, नरसिंघ यादव, गीता फोगट, साक्षी मलिक ऐसे नाम है, जो हरियाणा के ही नहीं, बल्कि भारत के भी शान है। पर इन नामों में योगेश्वर दत्त को भुलाया नहीं जा सकता, जिन्होंने अपने सपनों का सफर हरियाणा के एक छोटे से गाँव से की थी, लेकिन आज वो अपने अदम्य साहस और उत्क्रष्ट खेल शैली से भारत का नाम ना केवल एशिया में ही ऊंचा किया, बल्कि विश्व पटल पर भी किया।

 

 
व्यक्तिगत जानकारी
उपनाम योगी, पहलवान जी
जन्म 2 नवम्बर 1982 (आयु 34)
भैंसवाल कलाँ, गोहाना, जिला सोनीपत, हरियाणा
निवास हरियाणा
ऊंचाई 5 फीट 7 इंच (1.70 मी.)
माता एवं पिता का नाम सुशीला देवी (शिक्षक)

राममेहर (शिक्षक)

योगेश्वर दत्त का जन्म 2 नवंबर 1982 हरियाणा के सोनीपत में हुआ था। योगी बहुत ही शिक्षित परिवार से सम्बन्ध रखते हैं. उनकी माता अवं पिता दोनों ही शिक्षक के रूप में कार्यत हैं. यहाँ तक के उनके दादा जी भी शिक्षक थे. परिवार की ीचा थी की योगेश्वर भी पढ़ लिख कर उनके नक़्शे कदम पर चले पर किस्मत ने उनके लिए कुछ और ही चुना था. उनके गाँव का माहौल खेलों वाला था, खासकर पहलवानी का। उनके गाँव में बलराज नाम का पहलवान बड़ा मशहूर था, जिससे योगेश्वर 8 साल की उम्र में इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने पहलवानी सीखने की ठान ली। पहली बार सन १९९२ में जब योगी केवल पांचवी कक्षा में पढ़ रहे थे तब उन्होंने स्कूल स्तरीय कुश्ती प्रतियोगिता जीती। यहीं से योगी के परिवार ने उनके कुश्ती के प्रति रुझान को समझा और उन्हें पूरा पूरा प्रोत्साहन दिया। फिर उन्होंने पीछे मुद के नहीं देखा। चाहे वो १९९४ में पोलैंड में हुए इंटरनेशनल स्कूल कैडेट खेल प्रतियोगिता हो या फिर अस पास हो रहे दंगल उन्होंने अपनी म्हणत और कुश्ती के प्रति लगन से अपना नाम स्वयं बनाया।

सन १९९६ में वे अपनी पढाई पूरी कर दिल्ली के छतरसाल स्टेडियम में स्थानांतरित हो गए और अपना पूरा वक्त कुश्ती को समर्पित करने लगे।इसके बाद कई लोकल व् राष्ट्रीय स्तर पर पर पहलवानी प्रतिस्पर्धा जीतने के बाद 1999 के World Championship में गोल्ड जीतकर पहली बार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मजबूत दावेदारी को पेश किया।

2003

योगेश्वर दत्त ने अपने अंतर्राष्ट्रीय करियर की शुरुआत २००३ में आयोजित लंदन commonwealth खेलों से की जहाँ उन्होंने ५५ किलोग्राम फ्रीस्टाइल कटोगरी में स्वर्ण पदक जीतकर वह वही बटोरी। वे सन २००४ में भी एथेंस ओलंपिक्स कुश्ती टीम का हिस्सा रहे जहा ५५ किलो भर वर्ग में उन्हें १८ वे स्थान से संतोष करना पड़ा।

2006 Asian Games

२००६ के १५ वे एशियाई खेलों में केवल ९ दिन का समय शेष था योगी के पिता का देहांत हो गया। परिवार के काफी मानाने के बाद ही ये झुझारू पहलवान खेलों में शिरकत करने को तैयार हुआ। पर शया योगी के लिए और भी परीक्षाएं बाकि थी। उन्हें न केवल मानसिक परन्तु घुटने की शारीरिक चोट ने भी काफी परेशां किया। पर हरयाण की मिटटी में पीला बढे इस पहलवान ने सब दर्द भुला कर ६० किलोग्राम भर वर्ग में भारत को कांस्य पदक हासिल कराया।

2008 Summer Olympics

यह योगेश्वर का दूसराओलंपिक था। उन्होंने 2008 बीजिंग ओलंपिक में 60 किलोग्राम फ्रीस्टाइल कुश्ती में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने 2008 में दक्षिण कोरिया के जेजू सिटी में आयोजित एशियाई चैंपियनशिप में स्वर्ण जीतकर ओलंपिक के लिए अपना स्थान अर्जित किया। हालांकि ओलंपिक्स में उनका प्रदर्शन सामान्य ही रहा व् उनको ९ वे स्थान से संतोष होना पड़ा।

2010 Commonwealth Games

2010 के राष्ट्रमंडल खेलों में, योगेश्वर ने 60 किलोग्राम वर्ग में चोट से लड़ते हुए भारत के लिए स्वर्ण पदक अर्जित किया। योगेश्वर ने ये स्वर्णिम  फाइनल तक का सफर विश्व के जाने मने पहलवान ऑस्ट्रेलियाई मूल के  फ़ारजाद ताराश (16-0, 17-0), दक्षिण अफ्रीकी मारियस लूट्स (7-1) और इंग्लैंड के साशा माडियार्किक (4-4, 8-0)  को अपने कुशल प्रदर्शन से पटकनी देते हुए पूरा किआ ।

2012 Summer Olympics

योगेश्वर ने २०१२ ओलंपिक्स के लिए कज़ाखिस्तान में हुए क़्वालिफिएर मुकाबले में सिल्वर मैडल जित कर अपनी जगह पक्की की।

इसके पश्चात लंदन में आयोजित 30 वीं ओलंपिक खेलों में पुरुषों की फ्रीस्टाइल 60 किग्रा श्रेणी में एक यादगार प्रदर्शन करते हुए योगी ने भारत को कांस्य पदक दिलाया।  इस प्रकार सन १९५१ में के डी जाधव व् २०१२ में सुशिल कुमार के बाद योगी ओलंपिक्स खेलो में पदक लेन वाले तीसरे पहलवान बने। उनका आखरी शानो में पैर पकड़ने वाला दांव आज भी शायद ही कोई भारतीय भुला होगा वार्ना नीचे दिए हुए वीडियो से यादें ताजा कर ली जिए।

२०१२ में भारत सरकार द्वारा इन्हें राजीव गाँधी खेल रत्न का सम्मान दिया गया।

2014

सन २०१४ में ग्लासगो में आयोजित कोम्मोंवेल्थ कुश्ती प्रतियोगिता के ६० किलोgram भर वर्ग में योगेश्वर ने भारत का प्रतिनिध्त्वि किया और आशा के अनुरूप स्वर्ण पदक अर्जित करके देश का गौरव बढ़ाया। इसी साल हुए एशियाई खेलों में भी अपना दबदबा कायम रखते हुए ६५ किलो भर वर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त किआ।

सन २०१६ में हुए रिओ ओलंपिक्स में योगी जगह बनाने में जरूर सफल हुए पर उनका प्रदर्शन साधारण रहा।

सन २०१५ में शुरू हुए प्रो कुश्ती लगे के पहले संस्करण में योगेश्वर हरयाणा हम्मेर्स की टीम के कप्तान बने व् हर साल इसमें शिरकत कर रहे हैं। 33 साल के योगेश्‍वर अपने आप को राष्‍ट्रवादी मानते हैं। योगेश्‍वर के दोस्‍त बताते हैं वे अपने स्‍पष्‍टवादी हैं और कभी अपने मत केा छुपाते नहीं हैं। जेएनयू मामले के दौरान किए गए उनके ट्वीट ने काफी सुर्खियां बटोरी थी। इसके बाद जब सलमान खान को रियो ओलंपिक के लिए गुडविल एंबेसेडर बनाया गया तब भी योगेश्‍वर ने ट्वीट कर इस बात पर निशाना साधा था। नरसिंह यादव और सुशील कुमार के बीच रियो जाने को लेकर हुए तक विवाद में भी उन्‍होंने नरसिं‍ह की पैरवी की थी।

भारतीय कुश्ती चैंपियन योगेश्वर दत्त ने हाल ही में अपने जीवन में एक नया चरण शुरू किया। 33 वर्षीय ओलंपियन ने 16 जनवरी, 2017 को शीतल से शादी की। योगी ने एक बार फिर भारतीय युवाओं को सही दिशा दिखते हुए शादी में दहेज़ लेने से इंकार किया व् वधु पक्ष से शगुन के रूप में सिर्फ एक रुपया ही स्वीकार किया। उनकी धरम पत्नी शीतल शर्मा हरयाणा में कांग्रेस के नेता श्री जयभगवान शर्मा की सुपुत्री हैं।


भारत का राष्ट्रीय अवं अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व कर चुके इस खिलाडी ने न केवल हरयाणा का बल्कि पुरे देश का नाम रोशन किआ है। योगेश्वर आज भी मिटटी से जुड़े हैं व् चकचोँद से दूर अपना पूरा समय कुश्ती को देते हैं। इंडिया वौइस् के सौजन्य से निचे दिया हुआ उनका ये इंटरव्यू आपको उनके सीधे व् साधारण जीवन कुश्ती के प्रति उनकी लगन व् मेहनत तथा उनके जेवण के कुछ अनछुए पहलुओं से रूबरू कराएगा।