हरियाणवी कविता: घरआली

  मेरी घरआली धोरै नहीं कोए जैकपोट सै, एक टूटी होड खाट मैं वा मारै लोट सै। किसे काम तै वा जी नहीं चुरावै, हर एक काम मैं कती ओन द स्पोट सै। साबत दिन खेत का काम करै, सांझ कै लावै […]

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हरियाणवी कविता बेटी के पराई हो सै

  छोटी छोटी बात पै बेशक कितनी ए लड़ाई हो सै आदमी की सबसे बड़ी हिम्मत उसकी लुगाई हो सै पत्थर की भी छाती चीर दे सच में तारे तोड़ ल्यावे अगर मेहनतकश की सच्ची हौसला अफजाई हो सै किसे की हाय […]

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बचपन का टेम (काव्य)

  बचपन का टेम याद आ गया कितने काच्चे काटया करते, आलस का कोए काम ना था भाजे भाजे हांड्या करते । माचिस के ताश बनाया करते कित कित त ठा के ल्याया करते मोर के चंदे ठान ताई 4 बजे उठ […]

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शर्म लाज कति तार बगायी (काव्य)

  शर्म लाज कति तार बगायी या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी…! कट्ठे रह के कोए राजी कोनया ब्याह करते ए न्यारे पाटे हैं, माँ बाप की कोए सेवा नहीं करता सारे राखन त नाटे है । भाना की कोए कदर […]

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कितै ना दिखी सांझी माइ

  छोरी माट्टी ल्याया करती मुह अर हाथ बणाया करती गोबर तै चिपकाया करती नू सांझी बणाया करती कंठी कड़ूले पहराया करती आखं मै स्याही लाया करती चूंदड़ भी उढाया करती नू सांझी नै सजाया करती रोज सांझ नै आया करती गीत […]

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छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था

छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था,, एक नाई, एक खाती, एक काला लुहार था…. छोटे छोटे घर थे, हर आदमी बङा दिलदार था,, छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था..।। . कितै भी रोटी खा लेतै, हर घर मे भोजऩ […]

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एक हरियाणवी कविता होली सुसराड़ की

  मैं गया सुसराड़ नया कुर्ता गाड़ दाढ़ी बनवाई बाल रंग्वाए रेहड़ी पर ते संतरे तुलवाए हाथ मैं दो किलो फ्रूट मैं हो रया सुटम सूट फागन का महिना था आ रया पसीना था पोहंच गया गाम मैं मीठे मीठे घाम मैं […]

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