हरियाणवी कविता: घरआली

 


मेरी घरआली धोरै नहीं कोए जैकपोट सै,
एक टूटी होड खाट मैं वा मारै लोट सै।

किसे काम तै वा जी नहीं चुरावै,
हर एक काम मैं कती ओन द स्पोट सै।

साबत दिन खेत का काम करै,
सांझ कै लावै घास का भरोट सै।

वा नहीं खांदी चटपटी चीज,
लंच उसका लस्सी,बाजरै के रोट सै।

फैशन तो वा माङा सा करती ए कोन्य़ा,
ना कैटरीना के अंगारां तै भी होट सै।

के बताऊँ थामनै,वा मन्नै किसी आच्छी लागै,
उस मेरी जान कै हाथ मैं मेरी जान का रिमोट सै।

— मखौलिये जाट कह दे सच्ची बात

हरियाणवी कविता बेटी के पराई हो सै

 


छोटी छोटी बात पै बेशक
कितनी ए लड़ाई हो सै
आदमी की सबसे
बड़ी हिम्मत
उसकी लुगाई हो सै
पत्थर की भी छाती चीर
दे सच में तारे तोड़ ल्यावे
अगर मेहनतकश
की सच्ची हौसला अफजाई
हो सै
किसे की हाय लागै प्यार
में तो सदा याद राखियो
नजर उतारण की खातिर
बस नूण और राई हो सै
उस हरामी धन का के
कमीनेपण तै कोए जोड़ ले
असली दौलत तो अपणे दस
नूआं की कमाई हो सै
रिश्तेदारी हो या महोब्
पल्ले गांठ मार लियो
सच्चाई की झूठ बोलण तै
ना कदे भरपाई हो सै
अपनापण दिखावे तो बेटे
तै भी बढके दिखा दे
कमीनेपण पै आवे
तो खतरनाक जमाई हो सै
जब तक
जिन्दा रहवैगी माँ बाप
नै भूलती कोन्या
बेचैन झूठ कहवे सै लोग
बेटी तो पराई हो सै
–बेचैन


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#मनजीत सिंह फोगाट

बचपन का टेम (काव्य)

 

बचपन का टेम याद आ गया कितने काच्चे काटया करते,
आलस का कोए काम ना था भाजे भाजे हांड्या करते ।

माचिस के ताश बनाया करते कित कित त ठा के ल्याया करते
मोर के चंदे ठान ताई 4 बजे उठ के भाज जाया करते ।

ठा के तख्ती टांग के बस्ता स्कूल मे हम जाया करते,
स्कूल के टेम पे मीह बरस ज्या सारी हाना चाहया करते ।

गा के कविता सुनाके पहड़े पिटन त बच जाया करते,
राह म एक जोहड़ पड़े था उड़े तख्ती पोत ल्याया करते ।

“राजा की रानी रुससे जा माहरी तख्ती सूखे जा” कहके फेर सुखाया करते ,
नयी किताब आते ए हम असपे जिलत चड़ाया करते ।

सारे साल उस कहण्या फेर ना कदे खोल लखाया करते ,
बोतल की खाते आइसक्रीम हम बालां के मुरमुरे खाया करते ।

घरा म सबके टीवी ना था पड़ोसिया के देखन जाया करते
ज कोए हमने ना देखन दे फेर हेंडल गेर के आया करते ।

भरी दोफारी महस खोलके जोहड़ पे ले के जाया करते ,
बैठ के ऊपर या पकड़ पूछ ने हम भी बित्तर बड़ जाया करते ।

साँझ ने खेलते लुहकम लुहका कदे आती पाती खेलया करते,
कदे चंदगी की कदे चंदरभान की डांटा न हम झेलया करते ।

बुआ आर काका भी माहरे खूब ए लाड़ लड़ाया करते,
जब होती कदे पिटाई त बाबू ध्होरे छुड़वाया करते ।

खेता कहण्या जा के फेर नलके टूबेल पे नहाया करते,
चूल्हे ध्होरे बैठ के रोटी घी धर धर के खाया करते ।

होती फेर सोवन की तयारी दादा दादी कहानी सुनाया करते,
बिजली त कदे आवे ना थी बस बिजना हलाया करते ।

हल्की हल्की सी हवा लागती हमते फेर सो जाया करते,
तड़के न जब आँख खुलती सारे ऊट्ठे पाया करते ।

दूसरी खाटा के गुददड़े बत्ती सीले से पाया करते,
छोड़के अपनी खाट न दूसरी पे हटके सो जाया करते ।

जांगड़ा तू क्यां मै बड ग्या जा के कोए ईंट लगा ले न,
ज ईंट लगानी बसकी कोनया आरी राँड़ा ठाले न ।

यो शायरी का काम छोड़ दे इसने मै संभालूँगा,
औरा की त बात छोड़ तेरे पे भी वाह वाह कहवा ल्यूङ्गा ।

लिखण की कोए इच्छा ना थी उकसाया जांगड़ा भैया न।
जिद्दा म ये लाइन बना दी जितेंद्र नाम के दहिया न ॥

– जितेन्द्र दहिया

शर्म लाज कति तार बगायी (काव्य)

 

शर्म लाज कति तार बगायी या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी…!

कट्ठे रह के कोए राजी कोनया ब्याह करते ए न्यारे पाटे हैं,
माँ बाप की कोए सेवा नहीं करता सारे राखन त नाटे है ।
भाना की कोए कदर रही ना, साली ए प्यारी लागे है ,
सीधे कोथली भी देना नहीं चाहते ज़िम्मेदारी त भागे हैं ।
साली रोज घरा खड़ी रह बेबे जाती नहीं बुलाई ,
या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी… ।

बाजरे की रोटी भाती कोनया इब बर्गर पिज्जा खावें स ,
नशे पते के आदी होगे हुक्के न शान बतावें स …. ।
लाम्बे ठाड़े बालक खुगे ये त किसता प जीवें स ,
दूध दहि त कत्ती छूट गया शीत भी मांगया पीवें स ।
लूट खसोट भी गणही माचगी ना रही मेहनत की कमाई ,
या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी … ।

कड़े दोगड़ धर धर ल्याया करती इब बाल्टी म बा आवे स ,
घर ना हो चाहे दाने खान न काम करण आली आवे स ।
पहल्या 4 बजे उठ जाया करती इब 10 बजे ताई सोना चावे स ,
देख के सिर शर्म त झुक ज्या सासु न काम बतावे स….
ईवनिंग वॉक प जान लाग गी इब गामा की लुगाई
या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी … ।

बुड्ढे भी इब वे ना रहे कोए सयानी बात रही ना
किसे आती जाती न देख के बुझे किसकी बहू भाई या…?
बुड्ढे भी कति बालक होगे छोटी सी बात प ऐंठे स ,
भीरस्पत न लुगाई देखन खातर मंदिर प जा के बैठे स ।
ये भी न्यू कह अक टेम बदल गया ना रही माहरी किते सुनाई
या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी… ।

बिमार बहु का भी हाथ नहीं बटावे सतसंग में जाके झाड़ू ठावे है,
घाल कै कुर्सी बैठ भारणे आते ज्याता की चुगली लावे है।
भजन कीर्तन छोडके इब नाटका मै ध्यान लगावे है,
छोरा बटेऊ दोनू बस मै सारी बुढिया न्यू चावे है।
बहु ऐ क्यूँ ना इनने अपनी बेटी बनायीं,
या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी… ।

छोरी घर तै बाहर लिकड़ कै घनिये धरती काटे है,
माँ घरा कोए काम बतादे झट दे सी नै नाटे है।
छोटे छोटे लत्ते पहरणन ये फैशन बतावे है,
गलत चालण पै भी टोको मतना सारी छोरी न्यू चावे है।
लव मैरिज करण ताहि इनने घर मै करी लड़ाई,
या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी।

पहल्या आला पड़ोस रहया ना जिब,
राज़ी ख़ुशी रहया करे थे।
दुःख सुख मै जिब एक दूजे का पूरा साथ दिया करे थे,
देख कै इब का हाल मेरा दिल यो कत्ति टूट जया है।
कदे ओट्ड़े पै कदे नाली पै जिबे लठ उठ जया है,
कह ‘जितेन्द्र’ ना रही किसे मै थोड़ी सी भी समायी,
या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी… ।

मेहनत करके कोए राज़ी कोन्या पहल्या सारा दिन हल चलाया करते,
रोग बिमारी दूर रहवे थी मेहनत करके खाया करते।
पहल्या पैर उट्ठे थे महीने भर मै इब 2 दिन का काम भी बसकी कोन्या,
जो सपना देख्या था छोटूराम नै यो वो हरयाणा कोन्या।
सब किम हो गया महँगा ना रही खेती मै कोए कमाई,
या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी… ।

प्यार प्रेम राखो आपस म सब रह ल्यों बढ़िया तरिया,
के बेरा कद रुक ज्यावे यो किसके वक्त का पहिया।
“”जितेन्द्र नाम है मेरा एक त जाट ऊपर त दहिया ॥””

शर्म लाज कति तार बगायी या माहरे हरयाने मे किसी तरक्की आयी…!!

Author:जितेंद्र दहिया

कितै ना दिखी सांझी माइ

 

छोरी माट्टी ल्याया करती
मुह अर हाथ बणाया करती
गोबर तै चिपकाया करती
नू सांझी बणाया करती
कंठी कड़ूले पहराया करती
आखं मै स्याही लाया करती
चूंदड़ भी उढाया करती
नू सांझी नै सजाया करती
रोज सांझ नै आया करती
गीत संझा के गाया करती
घी मै मिट्ठा मिलाया करती
नूं सांझी नै जीमाया करती
सांझी का फेर आया भाई
अगड़ पड़ोसन देखण आई
कट्ठी होकै बूझै लुगाई
सांझी तेरे कितने भाई
फेर सांझी की होई विदाई
छोरी छारी घालण आई
हांडी के म्हा सांझी बैठाई
गैल्या उसका करदिया भाई
छोरी मिलकै गाया करती
हांडी नै सजाया करती
एक दीवा भी जलाया करती
फेर जोहड़ मै तिराया करती
हम भी गैल्या जाया करते
जोहड़ मै डल़े बगाया करते
सांझी नै सताया करते
फोड़ कै हांडी आया करते
ईब गया जब गाम मै भाई
सिमेंट टाईल अर नई पुताई
सारी भीत चमकती पाई
पर कितै ना दिखी सांझी माई
…कितै ना दिखी सांझी माइ

छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था


छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था,,
एक नाई, एक खाती, एक काला लुहार था….
छोटे छोटे घर थे, हर आदमी बङा दिलदार था,,
छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था..।।
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कितै भी रोटी खा लेतै, हर घर मे भोजऩ
तैयार था,,,
बिटोङे पे घिया तौरी हो जाती,,
जिसके आगे शाही पनीर बेकार था..
छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था।।।
.
दो मिऩट की मैगी ना, झटपट दलिया
तैयार था,,,
नीम की निम्बोली और शहतुत सदाबहार था…
अपणा घङवा कस कै बजा लेते, लख्मी पुरा
संगीतकार था,,,
छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था।।।
मुल्तानी माटी ते जोहड़ में नहा लेते,
साबुन अर
स्विमिंग पूल बेकार था,,,
अर फेर कबड्डी खेल लेते, कुन्सा म्हारे
क्रिकेट का
खुमार था,,,
छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था।।।
बुढ़या की बात सुन लेते, कुन्सा टेलीविज़न
अर
अखबार था,,,
भाई नै भाई देख कै राज़ी था, सबमै घणा
प्यार था,,,
छोटा सा गाम मेरा पुरा बिग् बाजार था।।।


वो प्यार, वो संस्कृति मैं इब कड़े तै ल्याऊं,
या सोच सोच कै मैं घणाए दुखी पाऊं।
जै वोए टैम फेर आज्या, तो घणाए मजा
आज्या,,,
मैं अपनी असली जिन्दगी जी पाऊं, अर मैं
इस
धरती पै सो सो शीश झुकाऊं।

—-हरियाणा के जानेमाने कवि  द्वारा लिखित

एक हरियाणवी कविता होली सुसराड़ की

 


मैं गया सुसराड़
नया कुर्ता गाड़

दाढ़ी बनवाई बाल रंग्वाए
रेहड़ी पर ते संतरे तुलवाए

हाथ मैं दो किलो फ्रूट
मैं हो रया सुटम सूट

फागन का महिना था
आ रया पसीना था

पोहंच गया गाम मैं
मीठे मीठे घाम मैं

सुसराड़ का टोरा था
मैं अकड में होरा था

साले मिलगे घर के बाहर
बोले आ रिश्तेदार आ रिश्तेदार

बस मेरी खातिरदारी शुरू होगी
रात ने खा पीके सोगया तडके मेरी बारी शुरू होगी

सोटे ले ले शाहले आगी
मेरे ते मिठाईया के पैसे मांगन लागी

दो दो चार चार सबने लगाये
पैसे भी दिए और सोटे भी खाए

साली भी मेरी मुह ने फेर गी
गाढ़ा रंग घोल के सर पे गेर गी

सारा टोरा होगया था ढिल्ला ढिल्ला
गात होगया लिल्ला लिल्ला गिल्ला गिल्ला

रहा सहा टोरा साला ने मिटा दिया
भर के कोली नाली में लिटा दिया

साँझ ताहि देहि काली आँख लाल होगी
बन्दर बरगी मेरी चाल होगी

बटेऊ हाडे तो नु हे सोटे खावेगा
बता फेर होली पे हाडे आवेगा

मैं हाथ जोड़ बोल्या या गलती फेर
नहीं दोहराऊंगा

होली तो के मैं थारे दिवाली ने
भी नहीं आउंगा………….