हरियाणवी कविता: माता बणकै बेटी जणकै बण मैं गेर गई / लखमीचंद

  माता बणकै बेटी जणकै बण मैं गेर गई पत्थर केसा दिल करके नै तज बेटी की मेर गई नौ महीने तक बोझ मरी और पेट पाड़ कै जाई लहू की बून्द गेर दी बण मैं शर्म तलक न आई न्यारी पाट […]

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हरियाणवी कविता: देखे मर्द नकारे हों सैं गरज-गरज के प्यारे हों सैं / लखमीचंद

  देखे मर्द नकारे हों सैं गरज-गरज के प्यारे हों सैं भीड़ पड़ी मैं न्यारे हों सैं तज के दीन ईमान नैं जानकी छेड़ी दशकन्धर नै, गौतम कै गया के सोची इन्द्र नै रामचन्द्र नै सीता ताहदी, गौरां शिवजी नै जड़ तै […]

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हरियाणवी कविता: कर जोड़ खड़ी सूं प्रभु लाज राखियो मेरी / लखमीचंद

  कर जोड़ खड़ी सूं प्रभु लाज राखियो मेरी मर्यादा को भूल गए दरबारां मैं शोर होग्या दादा भीष्म द्रोणाचारी का हिरदा क्यूं कठोर होग्या दुर्योधन दुशासन शकुनी कौरवों का जोर होग्या अधर्मी राजा की प्रजा गैल दुख पाया करै पाप की […]

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हरियाणवी कविता: हो पिया भीड़ पड़ी मैं / लखमीचंद

  हो पिया भीड़ पड़ी मैं नार मर्द की खास दवाई हो, मेल मैं टोटा के हो सै टोटे नफे आंवते जाते, सदा नहीं एकसार कर्मफल पाते उननै ना चाहते सिंगार जिनके, गात समाई हो, मर्द का खोटा के हो सै परण […]

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जीवन परिचय; सूर्य कवि पंडित लखमीचंद और उनका हरयाणवी कविता संग्रह

पंडित लख्मीचंद का जन्म गांव जांटी कलां (सोनीपत) के एक सामान्य किसान परिवार में हुआ था। परिवार का निर्वाह बड़ी कठिनाई से होता था इसलिए बालक लखमी को पाठशाला भेजने का प्रश्न ही नही उठता। लखमी को घर के पशु चराने का काम […]

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हरियाणवी कविता: के दुनियां मैं आई सो सब नरक कै बीच सड़ी सो / हरिचन्द

  के दुनियां मैं आई सो सब नरक कै बीच सड़ी सो हे ना कदर म्हारी सै कुए बीच पड़ी सो जन्म होण तै पहलां गळ पै करदें सैं खड़ी कटारी गरभ बीच म्हं मरवा दें सैं चालै सैं तेग दुधारी बहुत […]

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हरियाणवी कविता: तेरा मेरा एक शरीर सै रे / हरिचन्द

  तेरा मेरा एक शरीर सै रे, मां का जाया बीर सै रे ल्या कुछ फूल धराई दे बहण भाई का प्यार जगत म्हं, इसा और नहीं संसार जगत म्हं फेर बड़ा व्यवहार जगत म्हं, जो चलता रहै लगातार जगत म्हं इसी […]

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हरियाणवी कविता: आपस मैं हम लड़ां लड़ाई या असल कहाणी कोन्या / हरिचन्द

  आपस मैं हम लड़ां लड़ाई या असल कहाणी कोन्या म्हारै उल्टी शिक्षा ला राखी ईब तक जाणी कोन्या के तूं मेरा लेर्या सै मैं के खोसूं सुं तेरा होरे सां कंगाल फेर भी कररे मेरी मेरा नर्क म्हं म्हारा बसेबा होग्या […]

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हरियाणवी कविता: सुण मजदूर किसान मान तेरी दुख मैं ज्यान घली है / हरिचन्द

  सुण मजदूर किसान मान तेरी दुख मैं ज्यान घली है सारा कुणबा मंड्या रहै सै फेर भी सुख का सांस कोन्या एक बख्त टुकड़ा मिलज्या तो दुसरे की तनै आस कोन्या लाकड़ होग्या तेरे शरीर का रह्या गात पै मांस कोन्या […]

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हरियाणवी कविता: उल्टी गंगा पहाड़ चढा दी इसा नजारा देख लिया / हरिचन्द

  उल्टी गंगा पहाड़ चढा दी इसा नजारा देख लिया खेती करता भूखा मरता किसान बिचारा देख लिया एक मिन्ट की फुरसत ना तूं 24 घन्टे काज करै रोटी ऊपर नूण मिर्च फेर धरया मिलै सै प्याज तेरै काम की बाबत सब […]

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