हरियाणा में दिव्यांगों, बुजुर्गों व विधवाओं की पेंशन एक जनवरी, 2018 से 1800 रुपये कर दी जाएगी, जो देशभर में सर्वाधिक होगी।

हरियाणा में सामाजिक सुरक्षा के तहत सर्वाधिक 1600 रुपए मासिक पेंशन दी जा रही है। अगले साल जनवरी, 2018 से यह राशि 1800 रुपए और वर्ष 2019 में यह 2000 रुपए हो जाएगी।

एक तरफ जहाँ ये एक प्रशंशीय कदम है वहीँ हल ही के दिनों में पेंशनों में चल रही गड़बड़िओं ने हरियाणा के लोगों को विचलित किआ है। हरियाणा में हाल ही में 3 लाख से ज्यादा पेंशनर्स की सामाजिक सुरक्षा पेंशन बंद हुई  है . हरियाणा के चर्चित आईएएस अधिकारी डॉ. अशोक खेमका ने सामाजिक सुरक्षा पेंशन में बडा़ फर्जीवाड़ा पकड़ा है। प्रारंभिक जांच में पता चला कि करीब 1.80 लाख मामले ऐसे मिले, जिनमे एक ही आधार नंबर पर कई-कई लोगों को पेंशन दी जा रही थी।
जबकि 26 हजार से ज्यादा ऐसे लोग भी मिले जो हरियाणा के मूल निवासी होकर दूसरे राज्यों के रहने वाले हैं। करीब 45 हजार से ज्यादा पेंशनर्स ऐसे भी मिले जिन्होंने अपने आधार नंबर ही विभाग को नहीं दे रखे थे। इन गड़बडिय़ों के बाद सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग ने करीब 3.22 लाख लोगों की सामाजिक सुरक्षा पेंशन अगस्त महीने से ही रोक दी है।
विभागीय आंकड़ों के मुताबिक जुलाई माह में 24,23,350 पेंशनर्स को 382 करोड़ 34 लाख 89 हजार 800 रुपए की पेंशन दी गई थी। जबकि अगस्त में करीब 3.22 लाख लोगों की पेंशन रोकने के बाद 21,21,893 लोगों को 334 करोड़ 55 लाख 86 हजार 900 रुपए की पेंशन राशि दी गई। इस तरह पेंशन में हर महीने करीब 50 करोड़ रुपए का खेल हो रहा था। एक साल में यह रकम लगभग 600 करोड़ रुपए होती है।

  • 2316944 पेंशनर्समार्च, 2017 तक पंजीकृत थे
  • 1038314पेंशनर्सके ही आधार नंबर वेरिफाइड हुए
  • 936495पेंशनके नाम आधार कार्ड और विभागीय रिकॉर्ड में मैच नहीं कर रहे हैं।
  • 179190पेंशनर्सऐसे हैं जिनमें एक ही आधार नंबर कई बार यूज
  • 91914पेंशनर्सऐसे हैं जिनकी आधार संख्या गलत दर्ज की गई है
  • 45117पेंशनर्सऐसे भी हैं जिन्होंने अभी तक भी अपना आधार नंबर नहीं दिया है।
  • 26634पेंशनर्सऐसे हैं जो दूसरे राज्यों से संबंध रखते हैं। इनसे हरियाणा का मूल निवास प्रमाण मांगा गया है।

पेंशन में बड़ी बजट राशि खपने की वजह से प्रशासनिक अधिकारी इस मामले में ज्यादा सचेत हैं। इसलिए सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग अब प्रत्येक पेंशनर्स का ई-केवाईसी करवाने की तैयारी में है। इसके लिए प्रत्येक पेंशनर्स से हर साल जनवरी से मार्च के बीच एक फार्म भरवाया जाएगा। इसके लिए पेंशनर्स को 10 रुपए का शुल्क भी देना होगा। इस फार्म में आवेदक को अपनी आयु बताने के साथ ही यह भी घोषित करना होगा कि वह पेंशन लेने के लिए योग्य है। इसके साथ ही उनका बायोमैट्रिक अंगूठा और आंखों की पुतली का निशान भी लिया जाएगा। इससे उनका वेरिफिकेशन हो जाएगा कि लाभार्थी वास्तव में जीवित है। बाद में 10 रुपए का शुल्क उसे पेंशन के साथ वापस कर दिया जाएगा। ई-केवाईसी में उससे यह घोषणा भी कराई जाएगी कि अगर उसके द्वारा दिए गए तथ्य गलत पाए गए तो उससे दोगुनी राशि की वसूली के साथ ही कानूनी कार्रवाई भी की जा सकेगी।

हम उम्मीद करते है की हरियाणा सरकार सिर्फ मन  लुभावन  बातें व् योजनाए ही नहीं बल्कि योजना का निर्वहन भी पूरी ईमानदारी से करे व् करवाए।

गांव गुहणा का अद्भुत दरवाजा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय स्थित धरोहर हरियाणा संग्रहालय को मिला

 

कहते हैं कुछ अलग करने की ललक अगर दिल में सवार हो जाए तो वो रातों को नींद नहीं आने देती। बात चाहे अभिनय की हो, साहित्य लेखन की हो, मिट्टी की मूर्तियां बनाने की  हो या फिर लकड़ी से बनाई जाने वाली किसी अन्य चीज की हो। दरअसल हरियाणा के कैथल जिले के गुहणा गांव में एक अनौखा लकड़ी का दरवाजा तैयार किया हुआ है जो देखने लायक है, लेकिन अब ये दरवाजा कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय में धरोहर की शोभा बढाएगा।

 

किसने बनवाया था दरवाजा 

बता दें कि इस दरवाजे को बनाने की शुरूआत स्व. चौ. जातीराम जी चहल पुत्र स्व. नौरंग राम चहल पुत्र लालचंद चहल, श्योचंद चहल जीतराम चहल, आभेराम चहल, चंदगी राम चहल ने सन 1951 ( संवत 1921 ) में की। मिस्त्री मुलाराम गांव सीशमर व उनका एक साथी दोनो ने मिलकर ये दरवाजा गेट लगभग 14 महीनो में बनाकर तैयार किया। उनकी मजदूरी देशी घी की रोटी व 5 रूपए प्रतिदिन के हिसाब से थी।

संग्रहालय प्रभारी ने डॉ. महासिंह पूनिया ने बताया कि यह दरवाजा अपने आप में अदभुत है। इस दरवाजे में 100 किलो से अधिक मेख लगाई गई हैं। इसके साथ ही दरवाजों के दोनों पल्लों पर राम लक्ष्मण, कृष्ण और लक्ष्मी की मूर्तियां भी उकेरी गई हैं। इसके अलावा शीशम से बने इस दरवाजे पर हरियाणवी लोक परंपरागत शैली में चित्रकारी भी लकड़ी की खुदाई में अंकित है।

दरवाजा भेंट करने आए संदीप नितीश चहल ने बताया कि यह दरवाजा 20वीं सदी के आरंभ में बनाया गया था। इस दरवाजे को गांव शीशमर के मूला राम मिस्त्री ने 14 महीने में तैयार किया था। उस समय उनकी मजदूरी देशी घी से सनी रोटी और पांच रुपए दिहाड़ी प्रतिदिन के हिसाब से दी गई थी। उन्होंने बताया कि दरवाजे को देखने के लिए दूर-दूर से लोग उनके घर आया करते थे। इसके साथ ही शुरू में जब यह दरवाजा बना तो बुजुर्गों ने छह महीने तक पर्दा लगाकर रखा था। हरियाणवी कलाकारी के अदभुत नमूने के रूप में यह दरवाजा हरियाणवी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। संग्रहालय के प्रभारी डॉ. महासिंह पूनिया ने केयू प्रशासन की ओर से जाति राम चहल के परिवार के आभे राम चहल, चंदगी राम चहल, जीत राम चहल श्योचंद चहल का आभार जताया और प्रशस्ति पत्र सौंपा।

 

क्या है धरोहर

धरोहर हरियाणा के कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरूक्षेत्र में बना एक संग्रहालय है जहां पौराणिक व पारंपरिक चीजों को रखा जाता है। आपको बता दें कि संग्रहालय निदेशक महासिंह पुनिया का इसके लिए खास योगदान रहा है। पुनिया अलग-अलग जगहों से पारंपरिक कारीगरी, बुनाई, कढाई एवं और भी कई सामान धरोहर के लिए उपलब्ध करवा चुके हैं।

क्या दिल्ली में फैले प्रदुषण की समस्या के लिए हरयाणा के किसानों को जिम्मेदार मानना ठीक है ?

 

एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रदूषण के कारण दिल्ली में सालाना 10,000 से 30,000 जानें जा रही हैं. प्रदूषण हर दिन भारत की राजधानी में औसतन 80 लोगों की जान ले रहा है. दिल्ली की हवा में जब जब प्रदुषण का जहर घुला है उसका भांडा अक्सर हरयाणा के किसानो पर फोड़ा जाता है। तो आज चलिए उन लोगों को आईना दिखा ही दिए जाये जो सचाई से कोसों दूर हैं .

दिल्ली में पिछले तीन सालों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट के नाम पर सरकार ने क्या कदम उठाए ? जी हमने डीटीसी की बसों की संख्या 5500 से घटाकर 3600 कर दी जी। और हाँ मेट्रो के तीसरे फेज में बस तीन साल की देरी हुई है और हमने अभी तक 159 कम की लाइन में केवल 22 कम की लाइन जोड़ी है . और जी हां ये तो में भूल ही गया की हमारी दिल्ली में रोज़ सड़कों की सफाई वैक्यूम क्लीनर से होती है और आस्मां से पानी छिड़क कर धूल को दबाया जाता है। और हाँ ये तस्वीर तो दिल्ली की बिलकुल है ही नहीं हमारे यहाँ तो ज्यादातर लोग या तो पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते हैं या फिर साइकिल चलाकर ऑफिस पहुँचते हैं।

तो नेताजी हम आपको बता दे की केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम (एनएएमपी) के अनुसार, दिल्ली की हवा में 2009 से  पीएम 2.5 और पीएम 10 स्तरों में लगातार वार्षिक वृद्धि दर्ज की गयी। हाल की के वर्षों में (2015, 2016 और 2017) तो इनमे रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ोतरी हुई है। तो ऐसे में सिर्फ किसानो पर दोष मढ देना कहाँ तक सही है ये तो वही राजनेता व् सरकार बता सकती हैं जो केवल समस्या का निदान करने के बजाये बहाने बनाकर जनता को बेवक़ूफ़ बनाना चाह रही हो। या फिर आप ये कह दे की यहाँ प्रदुषण की समस्या केवल सर्दिओं में ही होती हैं जब हरयाणा में धन की कटाई होती है बाकि पूरा साल तो यहाँ कोई समस्या है ही नहीं।

आईआईटी दिल्ली ने पिछले साल निष्कर्ष निकाला कि दिल्ली को गाड़ियां सबसे ज्यादा प्रदूषित करती हैं। इसके बाद इंडस्ट्री, पावर प्लांट और घरेलू स्रोत प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं। वहीं, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा किए गए एक अध्ययन (2007-10) के मुताबिक गाड़ियों के उत्‍सजर्न से नाइट्रोजन ऑक्साइड बढ़ता है, जबकि पीएम 2.5 का कारण सड़क पर उड़ने वाली धूल है। इसके विपरीत दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने सीपीसीबी की रिपोर्ट को यह कहकर नकार दिया था कि उनकी कार्यप्रणाली दोषपूर्ण है। पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के रिसर्च फेलो भार्गव कृष्णा ने कहा कि चीजे काफी बदल चुकी हैं। उन्होंने कहा कि दिल्ली का चरित्र बदल चुका है और शहर में गाड़ियों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है। इसलिए सीपीसीबी के निष्कर्ष में खामिया हो सकती हैं। दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या के लिए आम तौर पर सीपीसीबी का अध्ययन इस्तेमाल किया जाता है।

तो आज जरुरत ये है की हम हर उस कारक का संज्ञान ले जो आज प्रदूषण के लिए उत्तरदाई है चाहे वो कंस्ट्रक्शन से उपजी धूल हो या फिर उधोगिक इकाईओं से निकलने वाला धुआं। राजधानी के लोगों की क्रय क्षमता बढ़ने के साथ साथ कारों की बिक्री में तेज बढ़ोत्तरी हुई है. हर रात राजधानी की सड़कों पर कम से कम एक करोड़ कारें अपने रास्ते चलती हैं. और एक ट्रांसपोर्ट रजिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट के आंकड़े के मुताबिक हर रोज़ लगभग 1200 नयी कारें दिल्ली की सड़कों पर उतर रहीं हैं। इसकी रोकथाम के लिए सर्कार को पब्लिक ट्रांसपोर्ट को और सशक्त करने की जरुरत है। इन सब के अलावा आपको यहाँ ये भी बताते चले की एनसीआर में हर रोज़ करीबन 10000 टन कूड़ा उत्पादित हो रहा है जिसमे से अधिकतर को आज भी जला कर निस्तांतरण किया जा रहा है। आप सब ने दिल्ली की करनाल बाईपास और ग़ाज़ीपुर लैंडफिल पर धूं धूं कर जलते हुए कूड़े की तस्वीरें देखि ही होंगी। तकनीक हमारे पास मजूद है। जरूरत है तो बस मंशा की वरना क्या मज़ाल की एक और तो हम करोड़ों की बुलेट ट्रैन जापान से ला रहे हैं और देश की राजधानी के कूड़े का इलाज करने के लिए बजट का अभाव है।


तो हम तो यही कहेंगे उन नेताओं से जो आज सिर्फ किसान पर ऊँगली उठा कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं की

दिल्ली की फिजाएं धुंआ धुंआ हैं

सरकारों के कान पर कोई रवां नहीं

लाइलाज सा हो चला है दर्दे शहर

हकीम कई हैं इसके, कोई दवा नहीं 

हम ये बिलकुल नहीं कह रहे की किसान जो खेतों में पराली जलाते हैं वो ठीक है और निश्चित ही कुछ समय के लिए ही सही पर ये भी आज दिल्ली पर छाए प्रदुषण का एक कारक है । हमारा बस इतना कहना है की सिर्फ पडोसी राज्य के किसान पर ऊँगली उठाने से विकास की दौड़ दौड़ रही हमारी राजधानी दिल्ली की समस्यायों का निपटारा हो जाता तो क्या ही बात थी तो कृपया नींद से जागें और सवच्छ दिल्ली के लिए साफ़ मंशा से हेलीकाप्टर से पानी छिड़कना छोड़ कर निचे उतर जमीं पर काम शुरू करें।


दोस्तो हमने रक्षाबंधन तो मना लिया ! पर क्या ये जरूरी नहीं है कि जान लें कि रक्षा सूत्र का असल में क्या महत्व है!

रक्षा बंधन का त्यौहार आज के परिप्रेक्ष्य में

 

प्राचीन काल में रक्षा सूत्र का महत्व कुछ अलग प्रकार से था –
रानी राजा को रक्षा सूत्र बांधती थी जब वह शत्रु से युद्ध के लिए जाता था! इस रक्षा सूत्र को बांधकर रानी कामना करती थी कि राजा युद्ध में विजय प्राप्त करे ताकि वह उसकी (पत्नी) की जीवन भर रक्षा कर सके! उस समय शत्रु जब विजयी हो जाता था तो स्त्री जाति की हालत सबसे खराब हो जाती थी !पराजित राजा की रानी एवं अन्य महल की स्त्रियों के साथ बदसुलूकी की जाती थी! उनका यौन शोषण तक किया जाता था! इसीलिए अधिकतर पराजित राजा के परिवार की स्त्रियों को जब यह सूचना मिलती कि राजा युद्ध भूमि में मारा गया तो वह जौहर कर लेती थी!

प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार देवताओं और दानवो के बीच युद्ध चल रहा था जिसमे दानवो की ताकत देवताओं से कई गुना अधिक थी. देवता हर बाजी हारते दिखाई पड़ रहे थे. देवराज इंद्र के चेहरे पर भी संकट के बादल उमड़ पड़े थे. उनकी ऐसी स्थिती देख उनकी पत्नी इन्द्राणी भयभीत एवं चिंतित थी. इन्द्राणी धर्मपरायण नारी थी उन्होंने अपने पति की रक्षा हेतु घनघोर तप किया और उस तप से एक रक्षासूत्र उत्पन्न किया जिसे इन्द्राणी ने इंद्र की दाहिनी कलाई पर बांधा. वह दिन श्रावण की पूर्णिमा का दिन था. और उस दिन देवताओं की जीत हुई और इंद्र सही सलामत स्वर्गलोक आये. तब एक रक्षासूत्र पत्नी ने अपने पति को बांधा था!
रानी कर्मवती ने हुंमायूं को रक्षा सूत्र भिजवा कर अपने राज्य की रक्षा की अपेक्षा की थी और हुंमायूं ने रक्षा सूत्र का फर्ज अदा कर कर्मवती के राज्य को बचाया!
ब्रहाम्ण अपने राजा को बांधते थे ताकि राजा सदैव उनकी व प्रजाजन की रक्षा करे! रक्षा सूत्र बांधकर बहन अपने भाई से जीवन भर अपनी रक्षा करने की कामना करती थी कि उसका भाई उसकी रक्षा करेगा !ससुराल में भी अगरउसके साथ कुछ गलत घटता है तो भाई उसकी मदद करेगा !

नारी शारीरिक बल में पुरुषों से कमजोर होती हैं!इस कारण सुरक्षा की दृष्टी से इस सुंदर त्यौहार को बनाया गया पर कलयुग के दौर में परिपाठी बदलती ही जा रही हैं!यह परम्परा जो समाज में एक सहयोग के भाव के साथ उपजी थी सिर्फ भाई -बहन के नाम पर मात्र एक औपचारिक त्यौहार बनकर रह गयी है ! इसके सही मायने बदलते जा रहे हैं !
यह परम्परा सबसे पहले तो सिर्फ भाई -बहन पर आ कर सिमट गई है! इतने सीमित दायरे में इतनी शुभ परम्परा का सिमटना समाज के नैतिक विकास के लिए सही नहीं है! इतना ही नहीं आज बहन भाइयों को राखी बाँधती है और उम्मीद करती है कि भाई उसे अच्छा व कीमती सा तौहफा दे! अगर भाई परिस्थिति वश ऐसा नहीं कर पाता तो वह बहन के दिल से उतर जाता है! रही बात रक्षा की तो आज के वक्त में हर कोई भौतिकता की दौड़ में शामिल हों गए हैं! आज भाई के पास बहनों के पास बैठकर बात करने का भी वक्त नहीं है! त्यौहार के बहाने साल में एक दिन भाई बहन मिलते हैं! बहने भी रक्षा के बजाय मंहगा उपहार पाकर संतुष्ट है!
भौतिक दोड में शामिल भाई बहन कच्चे धागे के असल मूल्य को भूल चुके हैं! वर्ष में एक दिन के लिए प्यार जगता है जो राखी के मूल्य (कीमती राखी) और मंहगे तौहफों पर आ कर खत्म हो जाता है!

कुछ वाकये तो ऐसे सामने आते हैं कि जिससे मानवता भी शर्मसार हो जाती है!
गरीब बहन अगर दुखी है तो भाई पिंड छुडाते फिरते है डर रहता है कि बहन तकलीफ में है कुछ मदद न मांग ले! कहीं ऐसा हुआ तो धर्म संकट आ जाएगा!
रक्षा सूत्र के मूल्य को क्या समझेंगे ये लोग ? फिर रक्षाबंधन पर एक दिन के लिए रक्षा सूत्र का आदान प्रदान हो जाते हैं और हो गया रक्षाबंधन!
कहीं कहीं बहने भी भाई की पॉकेट देखकर उसी के साइज के आधार पर राखी खरीदती हैं!
इस तरह से इस परम्परा का निर्वहन हमारे समाज के लिए घातक है! हमें वापस पीछे मुड़कर देखना होगा! जो शुभ हो उसे पूर्णता के साथ अपनाना होगा! सुप्त परम्परा को जाग्रत करने की आवश्यकता है! कुछ परम्परायें जो समाज के भले में सहायक है उनके प्रति नव चेतना की आवश्यकता है!परम्परा में पुनः विस्तार करने की आवश्यकता है!
कई जगह पर पत्नी अपने पति को राखी बांधती हैं! पति अपनी पत्नी को रक्षा का वचन देता हैं!सही मायने में यह त्यौहार नारी के प्रति रक्षा की भावना को बढ़ाने के लिए बनाया गया हैं!समाज में नारी की स्थिती बहुत गंभीर हैं क्यूंकि यह त्यौहार अपने मूल अस्तित्व से दूर हटता जा रहा हैं! जरुरत हैं इस त्यौहार के सही मायने को समझे एवम अपने आस पास के सभी लोगो को समझायें!अपने बच्चो को इस लेन देन से हटकर इस त्यौहार की परम्परा समझायें तब ही आगे जाकर यह त्यौहार अपने एतिहासिक मूल को प्राप्त कर सकेगा!
अब आईए सही मायने में रक्षा सूत्र बांधने और बंधवाने का संकल्प लें केवल औपचारिकता पूरी करने के लिए नहीं!

– अमृता अंजुम

हरियाणा के किसानों को खेती की उन्नत तकनीक सीखा रहा है घरौंडा में स्थित इंडो – इजराइल सेंटर

दुनिया में सबको भरपेट खाना मिले और जो खेतों में उगाया जा रहा है उसे सुरक्षित रखा जा सके ये बहुत बड़ी समस्या है। अकेले भारत में हर साल बिना रखरखाव के अरबों रुपये का अन्न बर्बाद हो जाता है। कभी सूखे से बिना पानी फसलें सूख जाती हैं तो कभी बाढ़ के सैलाब में खेत के खेत बर्बाद हो जाते हैं। जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है, वैसे-वैसे मांग भी बढ़ रही है। ऐसे में खेती और खाद्य सुरक्षा जरूरी होता जा रही है।

भारत ही नहीं दुनिया का लगभग हर देश इन समस्याओं से जूझ रहा है। लेकिन युवा किसानों का देश कहे जाने वाले इजरायल ने खेती से जुड़ी कई समस्याओं पर न सिर्फ विजय पाई है बल्कि दुनिया के सामने खेती को फायदे का सौदा बनाने के उदाहरण रखे हैं। अब इसी इजरायली तकनीक से हरियाणा में किसानो को न केवल सब्जियां उगाने की नयी दिशा दी है बल्कि पैदावार के नए आयाम छूने का मौका दिया है।

खड़ी या लंब (वर्टिकल) खेती, टपक (ड्रिप) सिंचाई, मृदा सौरीकरण और इसी तरह की कुछ और शब्दावलियों से 40 साल के किसान दीपक खातकर तब तक खासे परेशान थे जब तक कि वो दो साल पहले पहली बार सब्जियों की बेहतरी के लिए गठित भारत-इजरायल उत्कृष्ट केंद्र नहीं पहुंच गए। कौतूहल या जानने की इच्छा के चलते उन्होंने इजरायली खेती के कौशल को अपनाया और कुछ महीने के भीतर ही उत्पादन में उन्हें चौंकानेवाला पांच गुना तक का इजाफा देखने को मिला।

हरियाणा की राजधानी चंडीगढ़ से 145 किलोमीटर दूर स्थित छह हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस केंद्र को जनवरी 2011 में खोला गया। भारत सरकार ने छह करोड़ की लागत से इसकी स्थापना 2008 में भारत और इजरायल के बीच हुए कृषि सहयोग समझौते के तहत की थी। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से करीब 100 किलोमीटर दूर करनाल जिले के शेखपुरा खालसा गांव के खातकर कहते हैं, ‘हम लोग अपने खेतों में गेहूं और जौ की खेती परंपरागत तरीके से करते आ रहे थे लेकिन केंद्र पर जो तकनीक मैंने सीखी उसने मुझे सब्जी उत्पादन में हाथ आजमाने को बाध्य कर दिया।‘

करनाल में बागवानी के उपनिदेशक दीपक कुमार दत्तरवल ने कहा, 2010-11 में केंद्र खोले जाने के बाद उन्होंने 15,000 किसानों को प्रशिक्षण दिया है। उन्होंने कहा, किसान बागवानी की ओर बढ़ रहे हैं क्योंकि पारंपरिक फसलों मसलन गेहूं व धान के मुकाबले इसमें ज्यादा लाभ है। अन्य कारण मिट्टी का क्षरण, जमीन के आकार में सिकुडऩ और भूजल का गिरता स्तर है। हरियाणा सरकार के आंकड़ों से पता चलता है कि कुल 44.23 लाख हेक्टेयर में से करीब 50 फीसदी क्षेत्र मिट्टी क्षरण, लवणता और जलजमाव आदि से समस्याग्रस्त है। साथ ही जरूरत से ज्यादा पानी के दोहन के चलते कुल 22 जिले में से 10 को पहले से ही डार्क जोन में रख दिया गया है। लेकिन इजरायल की तकनीक के फायदे और बढ़ते लाभ के बावजूद हरियाणा में बागवानी में तेज रफ्तार से इजाफा नहीं हो रहा है। किसानों व विशेषज्ञों ने कहा कि यह मुख्य रूप से उच्च निवेश और इससे जुड़े जोखिम के चलते है। एक एकड़ में पॉलि हाउस स्थापित करने की लागत करीब 30 लाख रुपये है, जिसमें से 65 फीसदी हरियाणा सरकार से सब्सिडी मिलती है।

इस केंद्र में प्रशिक्षण के बाद एक किसान अवतार सिंह ने अपने खेत में पॉली हाउस स्थापित किया और आज खीरा और शिमला मिर्च की पैदावार खुले खेत के मुकाबले चार गुना बढ़ गई है। साथ ही आय में भी चार गुने का इजाफा हुआ

चार साल पहले हरियाणा के कैथल जिले के 42 वर्षीय किसान अवतार सिंह गुड़गांव से गुजर रहे थे तो उन्होंने पहली बार एक खेत में काफी ज्यादा पॉलि हाउस (उच्च मूल्य वाले कृषि उत्पादों की रक्षा के लिए पॉलीथीन से बना घर) देखा। कुछ रिश्तेदारों से पूछताछ करने के बाद वह करनाल में 2010-11 में स्थापित इंडो-इजरायल परियोजना सेंटर एक्सिलेंस फॉर वेजिटेबल पहुंच गए। सिंह को वहां इजरायल की कृषि तकनीक, कम लागत वाली ड्रिप सिंचाई की व्यवस्था और रोगमुक्त पौध बनाने के बारे में जानकारी मिली। उन्हें बिना सीजन वाली सब्जी उगाने का तीन दिन का प्रशिक्षण मिला। सिंह ने कहा, प्रशिक्षण के बाद हमने अपने खेत में पॉलि हाउस स्थापित किया और आज खीरा और शिमला मिर्च की पैदावार खुले खेत के मुकाबले चार गुना बढ़ गई है। साथ ही आय में भी चार गुने का इजाफा हुआ।



इजरायल के विशेषज्ञ लगातार केंद्र का दौरा करते रहते हैं और किसानों के लिए मुफ्त प्रशिक्षण सत्र का आयोजन करते हैं। इसमे उन्हें ‘रक्षात्मक कृषि’ के बारे में जानकारी दी जाती है और बताया जाता है कि कैसे पानी और खाद का कम से कम इस्तेमाल करते हुए ज्यादा फसल उगाई जा सकती है। जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ भी केंद्र का दौरा करते हैं। इसके अतिरिक्त, कॉर्पोरेट और पेशेवर लोगों को भी नाममात्र फीस में गुणवत्तावाली सब्जियों के उत्पादन के बारे में पढ़ाया जाता है।

हरियाणा में घरौंडा में खोले गये इस सब्जी उत्कृष्टता केंद्र की सफलता को देखते हुए हरियाणा सरकार ने इसी की तर्ज़ पर १६ नए सेण्टर खोलने का निर्णय लिया है।

यदि आप भी घरौंदा में इसरायली खेती की तकनीक सीखना चाहते है तो इस पते पर समपर्क कर सकते हैं।


Centre of Excellence for Vegetables
An Indo-Israel Project
Address: Opposite Liberty Shoes Company, National Highway-1, Gharaunda, Haryana 132114
Phone: 01748-251621
Email: cev.karnal@gmail.com, cev.gharaunda@gmail.com
Web: http://centreofexcellenceforvegetable.webs.com


 

हरियाणा की पहली महिला पायलट बनी प्रियंका

 

‘मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है’. ऐसा ही कुछ कर दिखाया फतेहाबाद के छोटे से गांव सूलीखेड़ा के छोटे से किसान की प्रियंका ने. बचपन में हवाइ जहाज को उड़ता देख उसे उड़ाने की बात करने वाली प्रियंका की बातों को अक्सर उसके सहपाठी और परिजन हंसी उड़ा दिया करते थे, लेकिन प्रियंका ने उसे न केवल अपना लक्ष्य बनाया बल्कि पूरा भी कर दिखाया, आज प्रियंका आसमान में हवाई जहाज उड़ा रही है.

प्रियंका की इस उपलब्धि का पता चलते ही उसके गांव में हर्ष की लहर दौड़ गई, प्रियंका के परिजन उसके सहपाठियों के साथ-साथ पूरे गांव में हर्ष का माहौल है.

प्रियंका के पिता सूरजमल ने बताया कि वर्ष 2006 में कड़ी मेहनत कर अपने बचपन के सपने को पूरा करने के दिशा में पहला कदम रखा. प्रियंका ने वर्ष 2007 में 10 जमा 2 की परीक्षा उत्तीर्ण की और इन्डियन एविएशन बोर्ड के एग्जाम में देहली फलाईंग क्लब से अपने सपने को साकार करने की शुरूआत की उसके बाद डब्ल्यूसीसी एक्सेल एयर एविएशन फलाईंग स्कूल, फिलिपिन्स से अपना प्रशिक्षण पूर्ण किया. फिलिपिन्स से अपना प्रशिक्षण पूरा करने के बाद प्रियंका ने सात चरणों की कठिन परीक्षा और प्रेक्टिकल व साक्षात्कार को बखूबी उत्तीर्ण करते हुए इंडिगो एअरलाइंस में बतौर पायलट नियुक्ति हासिल की है. इस नियुक्ति पर उनके परिवार के सदस्यों में खुशी का माहौल है.

वहीं प्रियंका ने इस उपलब्धि का श्रेय अपने माता-पिता और अपनी मेहनत और लगन को दिया है. प्रियंका के पति सुर्य प्रताप सिंह चहल बॉर्डर सिकोरिटी फोर्स में डिप्टी कमांडेंट के पद पर हैं तथा वर्तमान में फिरोजपुर पंजाब में तैनात हैं. प्रियंका अब अपने गांव के साथ—साथ सभी उन लड़कियों के लिए आज प्रेरणा बन चुकी है, जो सपने देखती है और कुछ बनना चाहती है. प्रियंका लड़कियों से कहती है कि सपने देखो और उसे पूरा करने के लिए दिन—रात एक कर दो, मंजिल अवश्य मिलेगी.


ये खबर News18 के सौजन्य से प्रस्तुत है।


 

…और छात्राओं ने भूख हड़ताल करके हासिल किया स्कूल

हरियाणा में गोठड़ा और राजगढ़ गांव में पिछले महीने तमाम छात्राएं गांव के स्कूल को बारहवीं तक करने की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठीं. अंतत: सरकार ने उनकी मांग मान ली.

 

हरियाणा में गोठड़ा और राजगढ़ गांव में पिछले महीने कई छात्राएं गांव के स्कूल को बारहवीं कक्षा तक करने की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठी थीं. छात्राओं के मुताबिक़ घर से स्कूल बहुत दूर हैं. अकेले रास्ता तय करने के दौरान उनके साथ छेड़छाड़ होती है. इस कारण परिवार वाले अक्सर ही उन पर पढ़ाई छोड़ने का दबाव डालते हैं.

रेवाड़ी ज़िले के गोठड़ा गांव की क़रीब 80 स्कूली छात्राएं 10 मई से भूख हड़ताल पर बैठी थीं. उनकी मांग थी कि उनके गांव के सरकारी स्कूल को दसवीं कक्षा से बढ़ाकर बारहवीं तक किया जाए. भूख हड़ताल आठवें दिन ख़त्म हुई जब सरकार ने उनकी मांग को स्वीकार कर एक पत्र जारी किया.

इन लड़कियों के हवाले से हिंदुस्तान टाइम्स का कहना है कि उन्होंने गांव के सरपंच से भी शिकायत की थी, जिन्होंने इस मामले को आगे भी बढ़ाया पर कोई हल नहीं निकला. इसलिए लड़कियों ने यह मांग उठाई कि उनके गांव के ही स्कूल को बारहवीं कक्षा तक अपग्रेड किया जाए. इसी मांग की पूर्ति के लिए वे भूख हड़ताल कर रही थीं.

वहीं गांव के सरपंच सुरेश चौहान बताते हैं, ‘इन बच्चियों को दूसरे गांव आने-जाने की समस्या तो है ही, पर इन्हें सड़क पर हो रही छेड़छाड़ का भी सामना करना पड़ता है. कुछ लड़के रोज़ाना बाइक पर हेलमेट पहनकर आते हैं और इन लड़कियों से बदतमीज़ी करते हैं. हेलमेट होने की वजह से उनकी पहचान भी नहीं हो पाती.

भारत में ब्राह्मणवादी पितृसत्ता, परिवार, समाज और राज्य के द्वारा अलग-अलग माध्यमों से रोज़मर्रा के जीवन में अपने मौजूद होने का एहसास कराती है. वहां हरियाणा जैसे राज्य जहां का जाति-वर्ग व्यवस्थित पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं को नियंत्रित करके रखता है और आए दिन खाप पंचायत से लेकर हरियाणा हाईकोर्ट भी महिला विरोधी आदेश सुनाती है.

वहां स्कूल की छात्राओं का ये आंदोलन जिसमें वो पढ़ने-लिखने को अपनी मुक्ति का एकमात्र रास्ता समझते हुए उस पढ़ाई के लिए लड़ रही हैं. छात्राएं अपने आंदोलन के ज़रिये समाज के जाति और पितृसत्तात्मक पिंजरों को तोड़ते हुए सरकार को अपनी मांगें पूरा करने के लिए मजबूर कर रही हैं. और आज के दौर में शिक्षा के निजीकरण के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठा रही हैं.

लड़कियों के इस आंदोलन के बाद ‘पिंजरा तोड़ आंदोलन’ की कुछ महिलाओं ने इन छात्राओं से मिलकर बातचीत की, उनके मुद्दे को समझा और आंदोलन के साथ एकजुटता दिखाई. इसके बाद पिंजरा तोड़ ने अपने सर्वेक्षण पर आधारित एक रिपोर्ट भी सार्वजनिक की.

इस रिपोर्ट में कहा गया, ‘मई के पहले हफ़्ते में गोठड़ा सरकारी हाई स्कूल की लगभग 80 छात्राएं अपने स्कूल को अपग्रेड करने की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठीं. भूख हड़ताल आठ दिन बाद ख़त्म हुई, जब सरकार ने उनकी मांग को स्वीकार कर एक पत्र जारी किया. छात्राओं को 4 किलोमीटर दूर कांवाली स्थित माध्यमिक विद्यालय तक जाने के रास्ते में अक्सर ही छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है. जिसके कारण अक्सर ही उनपर उनके परिवार द्वारा दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ने का दबाव बनाया जाता था और बहुत से माता पिता अपनी बेटियों को निजी स्कूलों में भेजने में असमर्थ होते हैं.

लड़कियों के मुताबिक उन्होंने सब करके देख लिया पर कुछ भी परिणाम न मिलने पर उन्हें भूख हड़ताल करने का रास्ता ही दिखा .स्कूल अपग्रेडेशन होने से उन छात्राओं को छेड़छाड़ के डर से अपनी पढ़ाई नहीं छोड़नी पड़ेगी.

राजगढ़ में 13 दिनों से हड़ताल पर बैठी छात्राओं का अनुभव भी कुछ मिलता जुलता रहा है. कुछ छात्राएं ख़ुश थीं कि स्कूल का बारहवीं तक अपग्रेडेशन होने से वो अपनी पढ़ाई जारी रख पाएंगी. यहां भी ये मांग लंबे समय से चल रही थी, यहां स्कूल को 2012 में ही सभी प्रकार की आवश्यकताओं और बुनियादी ढांचे उपलब्ध कराने के बावजूद लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए या तो 6 किमी दूर बालावास या बावल और रेवाड़ी के क़स्बों में जाना पड़ता था.

हालंकि रेवाड़ी और राजगढ़ दोनों ही जगह के स्कूल छात्राओं को सिर्फ़ आर्ट्स के माध्यम से ही पढ़ाई करने का मौक़ा दे पाते हैं. वर्तमान दौर में जब शिक्षा का निजीकरण इतने बड़े पैमाने पर हो रहा है, हरियाणा की छात्राओं का ये आंदोलन आपने आप में महत्वपूर्ण क़दम है, जिसके ज़रिये उन्होंने शिक्षा के निजीकरण के इस ढांचे को बड़ी चुनौती दी है. छात्राओं ने अपने आंदोलन से उन उत्पीड़कों को भी क़रारा जवाब दिया जो शायद ये सोचते थे कि लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करके उनको अपना उद्देश्य पूरा करने से रोक सकेंगे.

दसवीं के नतीजों की घोषणा के बाद हरियाणा में कई जगह नतीजों के पुनर्मूल्यांकन को लेकर प्रदर्शन हो रहे थे. साथ ही और भी जगहों पर जैसे जींद, सोनीपत, रेवाड़ी और बिलासपुर में भी छात्राओं के आंदोलन की गूंज सुनने को मिल रही थी. इन सभी जगह छात्राओं ने शिक्षा को सुलभ बनाने, कक्षाओं, स्कूलों और अध्यापकों की संख्या में वृद्धि, सुरक्षित वातावरण और अन्य बुनियादी सुविधाओं को छात्राओं तक पहुंचाने की मांग की थी.

छात्राओं की स्कूल अपग्रेडेशन की मांग को लेकर इस आंदोलन में मिली जीत से हर उस संघर्ष को प्रेरणा मिलती है जो घर से लेकर शैक्षिक संस्थानों तक भेदकारी ढांचों को हर रोज़ चुनौती दे रहे हैं. इन संघर्षों से छात्राओं ने उन सभी सामाजिक ढांचों और नीतियों को चुनौती देते हुए नकारा है जो शिक्षा को सुलभ बनाने के मार्ग में रोड़ा हैं.’

पिंजरा तोड़ आंदोलन की अंशिता दावर जो गोठड़ा गांव में सर्वेक्षण के लिए गई थीं, उन्होंने कहा, ‘इन छात्राओं का सामूहिक संघर्ष हमें प्रेरणा देता है, जहां विरोध करते हुए इन छात्राओं ने एक तरह से कहा कि सरकार को सबके लिए शिक्षा को सुलभ बनाना होगा. इनका संघर्ष पढ़ाई के लिए एक सुरक्षित माहौल की ज़रूरत को भी सामने लाया. इन छात्राओं का संघर्ष शिक्षा के निजीकरण को बड़ी चुनौती है, हम इन सभी महिलाओं के साथ एकजुट हैं.’

पिंजरा तोड़ आंदोलन से जुड़ी सुभाषिनी का कहना है कि ‘हमने इन छात्राओं से जाकर बात करना इसलिए ज़रूरी समझा क्योंकि हमारा संघर्ष सिर्फ़ उन 46 प्रतिशत तक सीमित नहीं है जो स्कूल तक आ चुकी हैं. अगर स्कूल के स्तर पर संघर्ष नहीं होगा तो स्कूल से उच्च शिक्षा तक महिलाएं कैसे पहुंचेंगी?’


ये खबर The Wire के सौजन्य से प्रस्तुत है।