हरियाणवी कविता: मैं छात पे खड़ा था वा भी छात पे खड़ी थी

मैं छात पे खड़ा था
वा भी छात पे खड़ी थी
बस नुहे मेरी उसपे नजर पड़ी थी
मैं उस ओड़ मुह करके खड़ा था
वा इस ओड़ मुह करके खड़ी थी
पर दोनुआ के बीच में एक गड़बड़ी थी
मैं अपनी छात पे खड़ा था
वा अपनी छात पे खड़ी थी
ना उसने मैं दिखा,
ना मन्ने उसका मुह दिखा
क्युकी मैं भी रात ने खड़ा था
और वा भी रात ने खड़ी थी
मैं खड़ा खड़ा नु सोचु था
वा छात पे क्यूँ खड़ी थी
छात पे खड़ी थी तो खड़ी थी
पर छात पे रात ने क्यूँ खड़ी थी
मन्ने एक काकर उठाई,
उस की ओड़ बगाई
वा काकर भी जाके उसके धोरे पड़ी थी
वा चांदणे में आई तो
उसके मुह पे नजर पड़ी थी
ओह तेरी के होगी बड़ी गड़बड़ी थी
जिसने मैं नू सोचु था के वा खड़ी थी
वा तो उसकी माँ खड़ी थी
मैं छात पे ते भाग के निचे आया
गली में देखा तो ताऊ भरतु हांडता पाया
जब मेरी नजर ताऊ भरतु पे पड़ी थी
तो मेरे समझ में आया के गड़बड़ी थी
वा इतनी रात ने छात पे क्यूँ खड़ी थी
वा इतनी रात ने छात पे न्यू खड़ी थी

म्हारी बोली सीख के दिखा दो

कम्बल के बाल न लफूसडा कह दयां,
जुत्यां न हम खोसडा कह दयां
नुक्सान होवे तो याता कह दयां
शादी-शुदा न ब्याहता कह दयां

सास न हम सासू कह दयां
आच्छे मानस न धांसू कह दयां
अर ख़त न कह दयां चिठ्ठी- चाठी,
धुन का पक्का कुहावे ठाठी

केले को हम केळा कह दयां,
मेले को हम मेळा कह दयां
छोरी न हम टिंगरी कह दयां
छेड़खानी न टिगली कह दयां
किते काम बिगड़े तो मठ मर ज्यां सै
म्हारी बोली तै लठ गड़ ज्या सै

पैसे न हम पिस्से कह दयां
आनंद न हम जीसे कह दयां
अर कह दयां बीडी-बाड़ी हम
दोस्त न कह दयां याडी हम

म्हारी बोली म्हारी सै,
सब बोलियां तै न्यारी सै
सबके बस की ना सै या
कोरी धमकी ना सै या
इसका व्याकरण टेढ़ा सै
इसके सारे बोल कोए लिख के दिखा दयो
जिसमे सै दम,

जो ना कतरावे डाकी कह दयां
खिड़की न हम झाखी कह दयां
टेढ़े न हम झोल कह दयां
थप्पड़ न हम धोल कह दयां
कालिये न हम भुंडा कह दयां
गंजे न हम रुंडा कह दयां
ह्म्भे माहरी हाँ होवे सै
अह म्हारी ना होवे सै

म्हारा कहना म्हारा सै
कडवा पानी खारा सै
म्हारी धोती क भी लांगड होवे
लठ लेरे तो बांगड़ होवे
सबके बसकी ना सै या
कोरी धमकी ना सै या

और जो प्यार करे अपनी बोली तै
कसुती ठाल शेयर करके बता दयो
कोए इसके आगे टिक ना सकदा
रर म्हारी बोली सीख के दिखा दियो

हरियाणवी कविता: जगह देख कै बाग़ लगा दिया छोटी-छोटी क्यारी / लखमीचंद

 

जगह देख कै बाग़ लगा दिया छोटी-छोटी क्यारी।
तरह तरह के फूल बाग में, खुश्बो न्यारी-न्यारी।|(टेक)

दो दरवाजे गड़े बाग़ में देख्या भीतर बड़-कै,
एक पानी का चलै फुहारा, मन चाहवै जब छिडकै,
माणस राख लिया बाग़ बीच में, बाग़ का माली घड़ कै,
पत्ता तक भी तोड़ण दे ना, देखीं जा गिर-पड़ कै।

ना देखै तै किस नै बतावै, उस्सै की जिम्मेवारी।
तरह तरह के फूल बाग में खुश्बो न्यारी-न्यारी।|

दो दरवाजे लगे बाग़ में न्यारे न्यारे पाग्ये।
एक दरवाजा इसा लग्या, जो भीत्तर चीज पहुन्चादे।
दो दरवाजे और लगे जो सारी खबर सुनादे।
एक दरवाजा इसा लग्या जो गंदगी बाहर बगा दे।

दो दरवाजे इसे बाग़ में या दीखै दुनिया सारी।
तरह तरह के फूल बाग में खुश्बो न्यारी-न्यारी।|

बाग़ बीच में फिर कै देख्या, काफी चीज खाण नै।
एक पानी का पम्प चलै था, पीवण और नहाण नै।
जितना पानी गन्दा हो, एक रास्ता बाहर जाण नै।
एक दरवाजे पै लौड़ स्पीकर आनंद राग गाण ने।

छुट्टी के दिन पूरे होग्ये, फिर आ पहुंचा दरबारी।
तरह तरह के फूल बाग में खुश्बो न्यारी-न्यारी।|

तार टूट-कै कटा कनेक्सन, देता नहीं सुनायी।
अंख्या के दर बंद होग्ये, कुछ देता नहीं दिखाई।
सारी चीज मिली बाग़ में, ना चीज बहार तैं आई।
बाग़ छोड़ कै बहार लिकड़ गया कुछ ना पार बसाई।

कह लखमीचंद इस बाग़ नै या दुनिया सिर पै ठा-री।
तरह तरह के फूल बाग में खुश्बो न्यारी न्यारी।|


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

इस पृष्ठ पर हरियाणा के प्रसिद्ध रचनकारों की रागनियाँ उपलब्ध करवाई गई हैं।

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हरियाणवी कविता: अलख अगोचर अजर अमर अन्तर्यामी असुरारी / लखमीचंद

 

लखमीचंद की एक मशहूर रागनी प्रस्तुत है जिसमे एक ही अक्षर से शब्द और पूरी पंक्ति की छन्द रचना की गई है।

अलख अगोचर अजर अमर अन्तर्यामी असुरारी
गुण गाऊं गोपाल गरुडगामी गोविन्द गिरधारी
परम परायण पुरुषोत्तम परिपूर्ण हो पुरुष पुराण
नारायण निरलेप निरन्तर निरंकार हो निर्माण
भागवत भक्त भजैं भयभंजन भ्रमभजा भगवान
धर्म धुरंधर ध्यानी ध्याव धरती धीरज ध्यान
सन्त सुजान सदा समदर्शी सुमरैं सब संसारी


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

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हरियाणवी कविता: एक चिड़िया के दो बच्चे थे, वे दूजी चीड़ी ने मार दिए / लखमीचंद

 

एक चिड़िया के दो बच्चे थे, वे दूजी चीड़ी ने मार दिए!
मैं मर गयी तो मेरे बच्चों ने मत ना दुःख भरतार दिए!!

एक चिड़े की चिड़िया मरगी, दूजी लाया ब्या के!
देख सोंप के बच्चों ने, वा बैठ गयी गम खा के!!
चिड़ा घर ते चला गया, फेर समझा और बुझा के!!
उस पापन ने वो दोनों बच्चे, तले गेर दिए ठा के!
चोंच मार के घायल कर दिए, चिड़िया ने जुलम गुजार दिए!!

एक चिड़िया के दो बच्चे थे, वे दूजी चीड़ी ने मार दिए!
मैं मर गयी तो मेरे बच्चों ने मत ना दुःख भरतार दिए!!

मैं मर जा तो मेरे पिया तू, दूजा ब्या करवायिए ना!
चाहे इन्दर की हूर मिले, पर बीर दूसरी लाईये ना!!
दो बेटे तेरे दिए राम ने, और तन्नै कुछ चायिए ना!!
रूप – बसंत की जोड़ी ने तू, कदे भी धमकायिये ना!
उढ़ा पराह और नुहा धूवा के, कर उनका श्रृंगार दिए!!
एक चिड़िया के दो बच्चे थे, वे दूजी चीड़ी ने मार दिए!
मैं मर गयी तो मेरे बच्चों ने मत ना दुःख भरतार दिए!!

याणे से की माँ मर जावे, धक्के खाते फिरा करे!
कोई घुड़का दे कोई धमका दे, दुःख विपदा में घिरा करे!!
नों करोड़ का लाल रेत में, बिन जोहरी के ज़रा करे!!
पाप की नैया अधम डूब जा, धर्म के बेड़े तिरा करे!
मरी हुई ने मन्ने याद करे तो, ला छाती के पुचकार दिए!!
एक चिड़िया के दो बच्चे थे, वे दूजी चीड़ी ने मार दिए!
मैं मर गयी तो मेरे बच्चों ने मत ना दुःख भरतार दिए!!

मेरा फ़र्ज़ से समझावन का,ना चलती तदबीर पिया!
रोया भी ना जाता मेरे, गया सुख नैन का नीर पिया!!
मेरी करनी मेरे आगे आगी, आगे तेरी तक़दीर पिया!!
लख्मीचंद तू मान कहे की, आ लिया समय आखिर पिया!!
मांगे राम ते इतनी कह के, रानी ने पैर पसार दिए!!

एक चिड़िया के दो बच्चे थे, वे दूजी चीड़ी ने मार दिए!
मैं मर गयी तो मेरे बच्चों ने मत ना दुःख भरतार दिए!!


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

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हरियाणवी कविता: लाख-चौरासी खतम हुई बीत कल्प-युग चार गए / लखमीचंद

 

लाख-चौरासी खतम हुई बीत कल्प-युग चार गए।
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए॥टेक॥

बहुत सी मां का दूध पिया पर आज म्हारै याद नहीं –
बहुत से भाई-बहन हुए, पर एक अंक दर याद नही।
बहुत सी संतान पैदा की, पर गए उनकी मर्याद नहीं –
बहुत पिताओं से पैदा हुए, पर उनका घर भी याद नहीं॥1॥

शुभ-अशुभ कर्म करे जग में, स्वर्ग-नरक कई बार गए।
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए॥

कहीं लिपटे रहे जेर में अपने कर्म करीने से –
कहीं अंडों में बंद रहे कहीं पैदा हुए पसीने से।
कहीं डूबे रहे जल में, कहीं उम्र कटी जल पीने से –
फिर भी कर्म हाथ नहीं आया, मौत भली इस जीने से॥2॥

कभी आर और कभी पार, डूब फिर से मंझधार गए।
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए॥

कभी तो मूल फूल में रम-ग्या, कभी हर्ष का स्योग लिया –
कभी निर्बलता कभी प्रबलता, कभी रोगी बण-कै रोग लिया।
कभी नृपत कभी छत्रधारी, कभी जोगी बण-कै जोग लिया –
भोग भोगने आये थे, उन भोगों ने हमको भोग लिया॥3॥

बड़े-बड़े योगी इस दुनियां में सोच-समझ सिर मार गए।
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए॥

आशा, तृष्णा और ईर्ष्या होनी चाहियें रस-रस में –
वो तो बस में हुई नहीं, हम हो गए उनके यश में।
न्यूं सोचूं था काम-क्रोध नै मार गिरा दूं गर्दिश में –
काम-क्रोध तै मरे नहीं, हम हो गए उनके बस में॥4॥

इतनी कहै-कै लखमीचंद भी मरे नहीं, दड़ मार गए।
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए॥


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

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हरियाणवी कविता: अरे ज्ञान बिना संसार दुखी, ज्ञान बिना दुःख सुख खेणा / लखमीचंद

 

अरे ज्ञान बिना संसार दुखी, ज्ञान बिना दुःख सुख खेणा,
ज्ञान से ऋषि तपस्या करते, जो तुझको पड़ा पड़ा सहणा!
ज्ञान से कार व्यवहार चालते, साहूकार से ऋण लेना!
ज्ञान से प्रजा का पालन करके, ब्याज मूल सब दे देना!
अरे ले कर्जा कोए मार किसे का, जो रहती ये सच्ची शान नही!
अधर्म करके जीना…

एक सत्यकाम ने गुरु की गउओं को इतने दिन तक चरा दिया,
जहाँ गई वो साथ गया, उसने प्रेम से उदर भरा दिया!
सत्यकाम ने गुरु के वचन को धर्मनाव पर तिरा दिया,
फ़िर से बात सुनी सांड की यम् का दर्शन करा दिया!
ज्ञानी पुरूष कोण कहे, पशुओं में भी भगवान् नही !
अधर्म करके जीना…
होए ज्ञान के कारण पृथ्वी, जल, वायु, तेज, आकाश खड़े:
ज्ञान के कारण सो कोस परे, ज्ञान के कारण पास खड़े!
मुझ को मोक्ष मिले होण ने, न्यू करके पूरी आस खड़े
जान जाओ पर रहो धर्म पे, इस देह का मान गुमान नही!
अधर्म करके जीना…

फेर अंत में क्या कहती है भला:
ज्ञान बिना मेरी टांग टूटगी, ज्ञान बिना कूदी खाई!
ज्ञान बिना में लंगडी होगी, ज्ञान बिना बुड्ढी ब्याई!
ज्ञान बिना तू मुझको खाता, कुछ मन में ध्यान करो भाई!
लख्मीचंद कह क्यों भूल गए सब, धर्म शरण की यो राही!
इस निराकार का बच्चा बन ज्या, क्यों कह मेरे में भगवान् नही!
अधर्म करके जीना चाहता, राजधर्म का ध्यान नही!
मोंत भूख का एक पिता है, फ़िर तुझे कैसे ज्ञान नही
अधर्म करके जीना चाहता, राज धर्म का ध्यान नही


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

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हरियाणवी कविता: हो-ग्या इंजन फेल चालण तैं, घंटे बंद, घडी रह-गी / लखमीचंद

 

हो-ग्या इंजन फेल चालण तैं, घंटे बंद, घडी रह-गी।
छोड़ ड्राइवर चल्या गया, टेशन पै रेल खड़ी रह-गी॥टेक॥

भर टी-टी का भेष रेल में बैठ वे कुफिया काल गये –
बंद हो-गी रफ्तार चलण तैं, पुर्जे सारे हाल गये।
पांच ठगां नै गोझ काट ली, डूब-डूब धन-माल गये –
बानवें करोड़ मुसाफिर थे, वे अपना सफर संभाल गये॥1॥

ऊठ-ऊठ कै चले गए, सब खाली सीट पड़ी रह-गी।
छोड़ ड्राइवर चल्या गया, टेशन पै रेल खड़ी रह-गी॥

टी-टी, गार्ड और ड्राइवर अपनी ड्यूटी त्याग गए –
जळ-ग्या सारा तेल खतम हो, कोयला पाणी आग गए।
पंखा फिरणा बंद हो-ग्या, बुझ लट्टू गैस चिराग गए –
पच्चीस पंच रेल मैं ढूंढण एक नै एक लाग गए॥2॥

वे भी डर तैं भाग गए, कोए झांखी खुली भिड़ी रह-गी।
छोड़ ड्राइवर चल्या गया, टेशन पै रेल खड़ी रह-गी॥

कल-पुर्जे सब जाम हुए भई, टूटी कै कोए बूटी ना –
बहत्तर गाडी खड़ी लाइन मैं, कील-कुहाड़ी टूटी ना।
तीन-सौ-साठ लाकडी लागी, अलग हुई कोई फूटी ना –
एक शख्स बिन रेल तेरी की, पाई तक भी ऊठी ना॥3॥

एक चीज तेरी टूटी ना, सब ठौड़-की-ठौड़ जुड़ी रह-गी।
छोड़ ड्राइवर चल्या गया, टेशन पै रेल खड़ी रह-गी॥

भरी पाप की रेल अड़ी तेरी पर्वत पहाड़ पाळ आगै –
धर्म-लाइन गई टूट तेरी नदिया नहर खाळ आगै।
चमन चिमनी का लैंप बुझ-ग्या आंधी हवा बाळ आगै –
किन्डम हो गई रेल तेरी जंक्शन जगत जाळ आगै॥4॥

कहै लखमीचंद काळ आगै बता किसकी आण अड़ी रहैगी ?
छोड़ ड्राइवर चल्या गया, टेशन पै रेल खड़ी रह-गी॥


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

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हरियाणवी कविता: कलियुग बोल्या परीक्षित ताहीं, मेरा ओसरा आया / लखमीचंद

 

कलियुग बोल्या परीक्षित ताहीं, मेरा ओसरा आया।
अपने रहण की खातिर मन्नै इसा गजट बणाया॥

सोने कै काई ला दूंगा, आंच साच पै कर दूंगा –
वेद-शास्त्र उपनिषदां नै मैं सतयुग खातिर धर दूंगा।
असली माणस छोडूं कोन्या, सारे गुंडे भर दूंगा –
साच बोलणियां माणस की मैं रे-रे-माटी कर दूंगा।

धड़ तैं सीस कतर दूंगा, मेरे सिर पै छत्र-छाया।
अपने रहण की खातिर मन्नै इसा गजट बणाया॥

मेरे राज मैं मौज करैंगे ठग डाकू चोर लुटेरे –
ले-कै दें ना, कर-कै खां ना, ऐसे सेवक मेरे।
सही माणस कदे ना पावै, कर दूं ऊजड़-डेरे –
पापी माणस की अर्थी पै जावैंगे फूल बिखेरे॥

ऐसे चक्कर चालैं मेरे मैं कर दूं मन का चाहया।
अपने रहण की खातिर मन्नै इसा गजट बणाया॥


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

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हरियाणवी कविता: समद ऋषि जी ज्ञानी हो-गे जिसनै वेद विचारा / लखमीचंद

 

समद ऋषि जी ज्ञानी हो-गे जिसनै वेद विचारा।
वेदव्यास जी कळूकाल का हाल लिखण लागे सारा॥ टेक॥

एक बाप के नौ-नौ बेटे, ना पेट भरण पावैगा –
बीर-मरद हों न्यारे-न्यारे, इसा बखत आवैगा।
घर-घर में होंगे पंचायती, कौन किसनै समझावैगा –
मनुष्य-मात्र का धर्म छोड़-कै, धन जोड़ा चाहवैगा।

कड़ कै न्यौळी बांध मरैंगे, मांग्या मिलै ना उधारा॥1॥
वेदव्यास जी कळूकाल का हाल लिखण लागे सारा।

लोभ के कारण बल घट ज्यांगे, पाप की जीत रहैगी –
भाई-भाण का चलै मुकदमा, बिगड़ी नीत रहैगी।
कोए मिलै ना यार जगत मैं, ना सच्ची प्रीत रहैगी –
भाई नै भाई मारैगा, ना कुल की रीत रहैगी।

बीर नौकरी करया करैंगी, फिर भी नहीं गुजारा॥2॥
वेदव्यास जी कळूकाल का हाल लिखण लागे सारा।

सारे कै प्रकाश कळू का, ना कच्चा घर पावैगा –
वेद शास्त्र उपनिषदां नै ना जाणनियां पावैगा।
गऊ लोप हो ज्यांगी दुनियां में, ना पाळनियां पावैगा –
मदिरा-मास नशे का सेवन, इसा बखत आवैगा।

संध्या-तर्पण हवन छूट ज्यां, और वस्तु जांगी बाराह॥3॥
वेदव्यास जी कळूकाल का हाल लिखण लागे सारा।

कहै लखमीचंद छत्रापण जा-गा, नीच का राज रहैगा –
हीजड़े मिनिस्टर बण्या करैंगे, बीर कै ताज रहैगा।
दखलंदाजी और रिश्वतखोरी सब बे-अंदाज रहैगा –
भाई नै तै भाई मारैगा, ना न्याय-इलाज रहैगा।

बीर उघाड़ै सिर हांडैंगी, जिन-पै दल खप-गे थे अठाराह॥4॥
वेदव्यास जी कळूकाल का हाल लिखण लागे सारा।


रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है जो आज स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हरियाणा में मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले गीतों में रागनी प्रमुख है। यहां रागनी एक स्वतंत्र व लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में प्रसिद्ध है। हरियाणा में रागनी की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं व सामान्य मनोरंजन हेतु रागनियां अहम् हैं। सांग (लोकनाट्य विधा) का आधार रागनियों ही थी। सांग धीरे-धीर विलुप्त हो गए तत्पश्चात रागनी एक स्वतंत्र एवं लोकप्रिय लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हुई।

इस पृष्ठ पर हरियाणा के प्रसिद्ध रचनकारों की रागनियाँ उपलब्ध करवाई गई हैं।

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