हरियाणवी कविता: मैं छात पे खड़ा था वा भी छात पे खड़ी थी

मैं छात पे खड़ा था वा भी छात पे खड़ी थी बस नुहे मेरी उसपे नजर पड़ी थी मैं उस ओड़ मुह करके खड़ा था वा इस ओड़ मुह करके खड़ी थी पर दोनुआ के बीच में एक गड़बड़ी थी मैं अपनी […]

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म्हारी बोली सीख के दिखा दो

कम्बल के बाल न लफूसडा कह दयां, जुत्यां न हम खोसडा कह दयां नुक्सान होवे तो याता कह दयां शादी-शुदा न ब्याहता कह दयां सास न हम सासू कह दयां आच्छे मानस न धांसू कह दयां अर ख़त न कह दयां चिठ्ठी- […]

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हरियाणवी कविता: जगह देख कै बाग़ लगा दिया छोटी-छोटी क्यारी / लखमीचंद

  जगह देख कै बाग़ लगा दिया छोटी-छोटी क्यारी। तरह तरह के फूल बाग में, खुश्बो न्यारी-न्यारी।|(टेक) दो दरवाजे गड़े बाग़ में देख्या भीतर बड़-कै, एक पानी का चलै फुहारा, मन चाहवै जब छिडकै, माणस राख लिया बाग़ बीच में, बाग़ का […]

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हरियाणवी कविता: अलख अगोचर अजर अमर अन्तर्यामी असुरारी / लखमीचंद

  लखमीचंद की एक मशहूर रागनी प्रस्तुत है जिसमे एक ही अक्षर से शब्द और पूरी पंक्ति की छन्द रचना की गई है। अलख अगोचर अजर अमर अन्तर्यामी असुरारी गुण गाऊं गोपाल गरुडगामी गोविन्द गिरधारी परम परायण पुरुषोत्तम परिपूर्ण हो पुरुष पुराण […]

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हरियाणवी कविता: एक चिड़िया के दो बच्चे थे, वे दूजी चीड़ी ने मार दिए / लखमीचंद

  एक चिड़िया के दो बच्चे थे, वे दूजी चीड़ी ने मार दिए! मैं मर गयी तो मेरे बच्चों ने मत ना दुःख भरतार दिए!! एक चिड़े की चिड़िया मरगी, दूजी लाया ब्या के! देख सोंप के बच्चों ने, वा बैठ गयी […]

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हरियाणवी कविता: लाख-चौरासी खतम हुई बीत कल्प-युग चार गए / लखमीचंद

  लाख-चौरासी खतम हुई बीत कल्प-युग चार गए। नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए॥टेक॥ बहुत सी मां का दूध पिया पर आज म्हारै याद नहीं – बहुत से भाई-बहन हुए, पर एक अंक दर याद नही। बहुत सी संतान […]

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हरियाणवी कविता: अरे ज्ञान बिना संसार दुखी, ज्ञान बिना दुःख सुख खेणा / लखमीचंद

  अरे ज्ञान बिना संसार दुखी, ज्ञान बिना दुःख सुख खेणा, ज्ञान से ऋषि तपस्या करते, जो तुझको पड़ा पड़ा सहणा! ज्ञान से कार व्यवहार चालते, साहूकार से ऋण लेना! ज्ञान से प्रजा का पालन करके, ब्याज मूल सब दे देना! अरे […]

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हरियाणवी कविता: हो-ग्या इंजन फेल चालण तैं, घंटे बंद, घडी रह-गी / लखमीचंद

  हो-ग्या इंजन फेल चालण तैं, घंटे बंद, घडी रह-गी। छोड़ ड्राइवर चल्या गया, टेशन पै रेल खड़ी रह-गी॥टेक॥ भर टी-टी का भेष रेल में बैठ वे कुफिया काल गये – बंद हो-गी रफ्तार चलण तैं, पुर्जे सारे हाल गये। पांच ठगां […]

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हरियाणवी कविता: कलियुग बोल्या परीक्षित ताहीं, मेरा ओसरा आया / लखमीचंद

  कलियुग बोल्या परीक्षित ताहीं, मेरा ओसरा आया। अपने रहण की खातिर मन्नै इसा गजट बणाया॥ सोने कै काई ला दूंगा, आंच साच पै कर दूंगा – वेद-शास्त्र उपनिषदां नै मैं सतयुग खातिर धर दूंगा। असली माणस छोडूं कोन्या, सारे गुंडे भर […]

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हरियाणवी कविता: समद ऋषि जी ज्ञानी हो-गे जिसनै वेद विचारा / लखमीचंद

  समद ऋषि जी ज्ञानी हो-गे जिसनै वेद विचारा। वेदव्यास जी कळूकाल का हाल लिखण लागे सारा॥ टेक॥ एक बाप के नौ-नौ बेटे, ना पेट भरण पावैगा – बीर-मरद हों न्यारे-न्यारे, इसा बखत आवैगा। घर-घर में होंगे पंचायती, कौन किसनै समझावैगा – […]

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