क्या जमींदारा एक अभिशाप हैं ?

  मैं 5 साल का ही पढ़ाई के लिए शहर चला गया था | जब छोटा था तो दादा जी के साथ खेत मे चला जाया करता था पर 1984 में दादा जी के देहांत के बाद हमने खेती बिलकुल छोड़ दी […]

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वारि समझ पड़ी के दुनिआ की चिंता तने ऐ शेधेगी

  एक ब एक बूढ़ा सा माणस अर उसका छोरा दूसरे गाम जाण लागरे थे। सवारी वास्तै एक खच्चर ह था। दोनो खच्चर पै सवार होकै चाल पड़े। रास्ते मैं कुछ लोग देख कै बोल्ले, “रै माड़ा खच्चर अर दो-दो सवारी। हे […]

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म्हारा हरियाणा – हरियाणवी संस्कृति साहित्य व भाषा को समर्पित एक प्रयास

  क्या आप ऐसी भूमि की कल्पना कर सकते हैं जहां परिवार के धन का निर्धारण इस बात से होता है की परिवार में गायों की संख्या कितनी है! जहां हर सुबह सूरज हरी धान के खेतों पर अपनी किरणों का रंग […]

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गर्मियों के दिन

  रचनाकार: कमलेश्वर चुंगी-दफ्तर खूब रँगा-चुँगा है । उसके फाटक पर इंद्रधनुषी आकार के बोर्ड लगे हुए हैं । सैयदअली पेंटर ने बड़े सधे हाथ से उन बोर्ड़ों को बनाया है । देखते-देखते शहर में बहुत-सी ऐसी दुकानें हो गई हैं, जिन पर […]

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वापसी

  रचनाकार: उषा प्रियंवदा गजाधर बाबू ने कमरे में जमा सामान पर एक नज़र दौड़ाई – दो बक्स, डोलची, बाल्टी। ”यह डिब्बा कैसा है, गनेशी?” उन्होंने पूछा। गनेशी बिस्तर बाँधता हुआ, कुछ गर्व, कुछ दु:ख, कुछ लज्जा से बोला, ”घरवाली ने साथ में […]

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पाजेब

  रचनाकार: जैनेन्द्र कुमार बाजार में एक नई तरह की पाजेब चली है। पैरों में पड़कर वे बड़ी अच्छी मालूम होती हैं। उनकी कड़ियां आपस में लचक के साथ जुड़ी रहती हैं कि पाजेब का मानो निज का आकार कु नहीं है, जिस […]

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