हरियाणवी कविता: मैं छात पे खड़ा था वा भी छात पे खड़ी थी

मैं छात पे खड़ा था वा भी छात पे खड़ी थी बस नुहे मेरी उसपे नजर पड़ी थी मैं उस ओड़ मुह करके खड़ा था वा इस ओड़ मुह करके खड़ी थी पर दोनुआ के बीच में एक गड़बड़ी थी मैं अपनी […]

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म्हारी बोली सीख के दिखा दो

कम्बल के बाल न लफूसडा कह दयां, जुत्यां न हम खोसडा कह दयां नुक्सान होवे तो याता कह दयां शादी-शुदा न ब्याहता कह दयां सास न हम सासू कह दयां आच्छे मानस न धांसू कह दयां अर ख़त न कह दयां चिठ्ठी- […]

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हरियाणवी कविता: के दुनियां मैं आई सो सब नरक कै बीच सड़ी सो / हरिचन्द

  के दुनियां मैं आई सो सब नरक कै बीच सड़ी सो हे ना कदर म्हारी सै कुए बीच पड़ी सो जन्म होण तै पहलां गळ पै करदें सैं खड़ी कटारी गरभ बीच म्हं मरवा दें सैं चालै सैं तेग दुधारी बहुत […]

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हरियाणवी कविता: तेरा मेरा एक शरीर सै रे / हरिचन्द

  तेरा मेरा एक शरीर सै रे, मां का जाया बीर सै रे ल्या कुछ फूल धराई दे बहण भाई का प्यार जगत म्हं, इसा और नहीं संसार जगत म्हं फेर बड़ा व्यवहार जगत म्हं, जो चलता रहै लगातार जगत म्हं इसी […]

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हरियाणवी कविता: आपस मैं हम लड़ां लड़ाई या असल कहाणी कोन्या / हरिचन्द

  आपस मैं हम लड़ां लड़ाई या असल कहाणी कोन्या म्हारै उल्टी शिक्षा ला राखी ईब तक जाणी कोन्या के तूं मेरा लेर्या सै मैं के खोसूं सुं तेरा होरे सां कंगाल फेर भी कररे मेरी मेरा नर्क म्हं म्हारा बसेबा होग्या […]

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हरियाणवी कविता: सुण मजदूर किसान मान तेरी दुख मैं ज्यान घली है / हरिचन्द

  सुण मजदूर किसान मान तेरी दुख मैं ज्यान घली है सारा कुणबा मंड्या रहै सै फेर भी सुख का सांस कोन्या एक बख्त टुकड़ा मिलज्या तो दुसरे की तनै आस कोन्या लाकड़ होग्या तेरे शरीर का रह्या गात पै मांस कोन्या […]

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हरियाणवी कविता; इब्ब के होवेगा ?

इब्ब उम्र देवे साथ , उलाद ना देवे हाथ , इब्ब के होवेगा ? मेरे बटे ,एक्ला , बैठ कूण में रोवेगा ॥  दिन थे तेरे कमाण के , जिब्ब खेले तन्ने ताश , बाळक रहए ना धोरे , घर का सत्यानाश […]

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हरियाणवी कविता: आजादी म्हारे हिन्दुस्तान की

  बस देख ली आजादी हामनै म्हारे हिन्दुस्तान की । सबतैं बुरी हालत सै आज मजदूर और किसान की ।। न्यूं कहो थे हाळियाँ नै सब आराम हो ज्यांगे – खेतों में पानी के सब इंतजाम हो ज्यांगे । घणी कमाई होवैगी, […]

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हरियाणवी कविता: घरआली

  मेरी घरआली धोरै नहीं कोए जैकपोट सै, एक टूटी होड खाट मैं वा मारै लोट सै। किसे काम तै वा जी नहीं चुरावै, हर एक काम मैं कती ओन द स्पोट सै। साबत दिन खेत का काम करै, सांझ कै लावै […]

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हरियाणवी कविता बेटी के पराई हो सै

  छोटी छोटी बात पै बेशक कितनी ए लड़ाई हो सै आदमी की सबसे बड़ी हिम्मत उसकी लुगाई हो सै पत्थर की भी छाती चीर दे सच में तारे तोड़ ल्यावे अगर मेहनतकश की सच्ची हौसला अफजाई हो सै किसे की हाय […]

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