हरियाणवी कविता: तेरी झांकी के माहं गोल मारूं मैं बांठ गोफिया सण का / लखमीचंद

  तेरी झांकी के माहं गोल मारूं मैं बांठ गोफिया सण का एक निशाना चुकण दयूं ना मैं छलिया बालकपण का लांबे-लांबे केश तेरे जंणू छारहि घटा पटेरे पै ढुंगे ऊपर चोटी काली जंणू लटकै नाग मंडेरे तै घणी देर मैं नजर […]

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हरियाणवी कविता: आधी रात सिखर तैं ढलगी हुया पहर का तड़का / लखमीचंद

  आधी रात सिखर तैं ढलगी हुया पहर का तड़का। बिना जीव की कामनी कै हुया अचानक लड़का। जब लड़के का जन्म हुया ये तीन लोक थर्राए। ब्रह्मा विष्णु शिवजी तीनू दर्शन करने आये। सप्त ऋषि भी आसन ठा कै हवन करण […]

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हरियाणवी कविता: भाईयो बेरा ना के चाला रै ये घडी मै दे सें गर्द मिला / लखमीचंद

  भाईयो बेरा ना के चाला रै ये घडी मै दे सें गर्द मिला।(टेक) ब्रह्मा विष्णु सारे मोहे भस्मासुर से मारे गए। जमदग्नि पुलिस्त मुनि पतंजली बिचारे गए। मेर और सुमेर सुनो सीस जिन के तारे गए। बारासूर बनाद भाई गौतम जी […]

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हरियाणवी कविता: रै संता सील सबर संतोष श्रधा शर्म समाई सै / लखमीचंद

  रै संता सील सबर संतोष श्रधा शर्म समाई सै, यो साधन संत शरीर का।|(टेक) भय भूल भ्रम ने त्याग, विषय वासना बैर की लाग। अरै जा जाग जरा नाजोश जहर जड़ जबर जमाई सै यो जोबन जाल जंजीर का। रै संता […]

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हरियाणवी कविता: मत चालै मेरी गेल तनै घरबार चाहिएगा / लखमीचंद

  मत चालै मेरी गेल तनै घरबार चाहिएगा मैं निर्धन कंगाल तनैं परिवार चाहिएगा लाग्या मेरै कंगाली का नश्तर, सूरा के करले बिन शस्त्र तनै टूम ठेकरी गहणा वस्त्र सब सिंगार चाहिएगा एक रत्न जड़ाऊ नौ लखा गळ का हार चाहिएगा मेरे […]

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हरियाणवी कविता: यो भारत खो दिया फर्क नै इसमैं कोए कोए माणस बाकी सै / लखमीचंद

  यो भारत खो दिया फर्क नै इसमैं कोए कोए माणस बाकी सै घणे मित्र तै दगा कुमाल्यें, चीज ल्हुकमां प्यारे की ठाल्यें बेटी बेच-बेच धन खाल्यें, मुश्किल रीत बरतणी न्या की सै नहीं कुकर्म करणे तै डरते, दिन-रात नीत बदी पै […]

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हरियाणवी कविता: सारा कुणबा भरया उमंग मैं घरां बहोड़िया आई / लखमीचंद

  सारा कुणबा भरया उमंग मैं घरां बहोड़िया आई प्रेम मैं भर कै सासू नैं झट पीढ़ा घाल बिठाई फूलां के म्हं तोलण जोगी बहू उमर की बाली पतला-पतला चीर चिमकती चोटी काळी-काळी धन-धन इसके मात पिता नै लाड लडाकै पाळी गहणे […]

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हरियाणवी कविता: कदे ना सोची आपतै के दो-च्यार आने ले ले / लखमीचंद

  कदे ना सोची आपतै के दो-च्यार आने ले ले मेरा खर्च डेढ़ पा चून का, कीमत ना दो धेले कंगला लड़का नीवै सै रै, जख्म जिगर नै सीवै सै रै तूं मुंह ला ला कै पीवै सै रै भर दूधां के […]

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हरियाणवी कविता: लाख चौरासी जीया जून मैं नाचै दुनिया सारी / लखमीचंद

  लाख चौरासी जीया जून मैं नाचै दुनिया सारी नाचण मैं के दोष बता या अकल की हुशियारी सब तै पहलम विष्णु नाच्या पृथ्वी ऊपर आकै फिर दूजे भस्मासुर नाच्या सारा नाच नचा कै गौरां आगै शिवजी नाच्या ल्या पार्वती नै ब्याह […]

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हरियाणवी कविता: दुख मैं बीतैं जिन्दगी न्यूं दिन रात दुखिया की / लखमीचंद

  दुख मैं बीतैं जिन्दगी न्यूं दिन रात दुखिया की के बूझैगी रहणदयो बस बात दुखिया की के बूझो छाती मैं घा सै बोलतेए हिरदा पाट्या जा सै और दूसरा नां सै दुख मैं साथ दुखिया की मेरा ना किसे चीज मैं […]

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